कुछ दाने, कुछ मिट्टी किंचित सावन शेष रहे । सूरज अवसादित हो बैठा ऋतुओं में अनबन, नदिया-पर्वत-सागर रूठे पवनों में जकड़न, जो हो, बस आशा-ऊर्जा का दामन शेष रहे । मौन हुए सब पंख-पखेरू झरनों का कलकल, नीरवता को भंग कर रहा कोई कोलाहल, जो हो, संवादी सुर में अब गायन शेष रह...