ब्लॉगसेतु

सुशील बाकलीवाल
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      अभी कुछ समय पूर्व एक रेलयात्रा के दौरान सामने की बर्थ पर बैठी एक माँ और उसकी बच्ची में कुछ रोचक सा देखने को मिला और वो यह कि उसकी माँ जब मेरी पत्नी सहित अन्य महिलाओं से बात कर रही थी तब उसकी छोटी बच्ची उसकी उम्र की बाल-कहानियां पढ रही थी । उसकी...
kumarendra singh sengar
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आज के तकनीक भरे दौर में जबकि लोग मशीनों पर ज्यादा निर्भर हो चुके हैं, ऐसे में कोई किताबों की बात करे तो आश्चर्य लगता है. इस आश्चर्य में उस समय और भी वृद्धि हो जाती है जबकि पता चलता है कि महज किताबों की बात नहीं की जा रही वरन बच्चों में किताबें पढ़ने के प्रति ललक पैद...
अनीता सैनी
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तल्ख़ियाँ तौल रहा तराज़ू से ज़माने नैतिकता को क्षणभँगुर किया,    दौर फिर वही वक़्त दोहराने लगा,  हटा आँखों से अहम-वहम की पट्टीवक़्त ने फ़रेब का शृंगार किया | संस्कारों में है सुरक्षित आज की नारी,   एहसास यही लगा...
kumarendra singh sengar
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परिवार में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने आपमें एक आधार स्तम्भ होते हैं. उनके न कहने के बाद भी वे किसी न किसी रूप में परिवार को एकसूत्र में जोड़े रखने का काम करते हैं. परिवार की मान-मर्यादा को, उसकी प्रतिष्ठा को, उसके वर्चस्व को ऐसे ही लोगों के द्वारा स्वतः ही स्थापना...
kumarendra singh sengar
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आधुनिकता का पर्याप्त प्रभाव होने के बाद भी बुन्देलखण्ड क्षेत्र में पावन पर्व कजली उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. यहाँ की लोक-परम्परा में शौर्य-त्याग-समर्पण-वीरता के प्रतीक मने जाने वाले कजली का विशेष महत्त्व है. इस क्षेत्र के परम वीर भाइयों, आल्हा-ऊदल के श...
kumarendra singh sengar
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इधर बहुत लम्बे समय से कुछ पढ़ा नहीं जा रहा था. कुछ अजीब तरह की व्यस्तताएँ अनावश्यक रूप से घेरे हुए थीं. कुछ ऐसा भी इन दिनों हुआ कि खुद आलस्य के साथ दोस्ती कर ली थी. इसके अलावा चुनावी माहौल आने के चलते होने वाली खुद बुलाई व्यस्तता के साथ-साथ सोशल मीडिया की गैर-जरूरी...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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लोग कहते हैंज़िन्दगी की रफ़्तारतेज़ हो गयी हैबढ़ते पेड़-पौधेसूरज-चाँद-तारेदिन-रातघोंसलों में लौटते पक्षीगर्भावस्थाजंगल का स्वाभावआदर्शवाद से लगाव नदी का बहावसमुद्री ज्वार-भाटा  साँसों की गतिह्रदय की धड़कन जैसे थे वैसे हैंअहम् का टकरावकृत्रिमता का फैला...
kumarendra singh sengar
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हम लोगों के लिए होली का मतलब हमेशा से हुल्लड़ से ही रहा है. उस समय भी जबकि हम छोटे से थे, उस समय भी जब हम किशोरावस्था में कहे जा सकते थे और तब भी जबकि हमें भी बड़ा माना जाने लगा था. हमारे लिए ही नहीं, हमारे पूरे परिवार के लिए होली का मतलब खूब मस्ती, खूब हुल्लड़, खूब ह...
kumarendra singh sengar
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शिक्षा समाप्ति के बाद दिमाग में प्रशासनिक सेवा में जाने का कीड़ा कुलबुला रहा था. उसके साथ-साथ खुद को आर्थिक आधार पर खड़ा करने की सोच भी काम कर रही थी. नब्बे के दशक में बहुत सारी स्थितियाँ सहायक सिद्ध होती थीं तो बहुत सी स्थितियाँ विपरीत दिशा में काम करती थीं. उनकी सह...
kumarendra singh sengar
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आज अम्मा जी का जन्मदिन है. जन्मदिन मनाने की परम्परा हम बच्चों की कभी नहीं रही उसी तरह की आदत सी बनी हुई है, ये और बात है कि आधुनिकता के चलते अब हम अपने बच्चों के जन्मदिन मनाने लगे हैं. हाँ, हमारे बच्चे ही हमारा जन्मदिन मनाने लगे हैं. हमारे अम्मा-पिताजी ने कभी हमारा...