ब्लॉगसेतु

Rajeev Upadhyay
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शीर्षक में यह स्वीकार कर लिया गया है कि लेख का विषय 'साहित्य-बोध' है; पर वास्तव में इस अर्थ में इसका प्रयोग चिंत्य है। यह मान भी लें कि लोक-व्यवहार बहुत से शब्दों को ऐसा विशेष अर्थ दे देता है जो यों उनसे सिद्ध न होता, तो भी अभी तक ऐसा जान पड़ता है कि समकालीन संदर्...
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--मात-पिता के चरण छू, प्रभु का करना ध्यान।कभी न इनका कीजिए, जीवन में अपमान।१।--वासन्ती मौसम हुआ, काम रहा है जाग।बगिया में गाने लगे, कोयल-कागा राग।२।--लोगों ने अब प्यार को, समझ लिया आसान।अपने ढंग से कर रहे, प्रेमी अनुसंधान।३।--खेल हुआ अब प्यार का, आडम्बर से युक...
Rajeev Upadhyay
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आ गए प्रियंवद! केशकंबली! गुफा-गेह!राजा ने आसन दिया। कहा :'कृतकृत्य हुआ मैं तात! पधारे आप।भरोसा है अब मुझ कोसाध आज मेरे जीवन की पूरी होगी!'लघु संकेत समझ राजा कागण दौड़े। लाये असाध्य वीणा,साधक के आगे रख उस को, हट गए।सभी की उत्सुक आँखेंएक बार वीणा को लख, टिक गईंप्रियं...
kumarendra singh sengar
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अपनी उम्र के चार दशक गुजारने के बाद आत्मकथा लिखना हुआ. इसमें अपने जीवन के चालीस वर्षों की वह कहानी प्रस्तुत की गई जिसे हमने अपनी दृष्टि से देखा और महसूस किया. कुछ सच्ची कुछ झूठी के रूप में आत्मकथा कम अपनी जीवन-दृष्टि ही सामने आई. व्यावसायिक रूप से, प्रकाशन की आर्थि...
Bharat Tiwari
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उस दिन शायद पहली बार मैंने अपने पिताजी से पूछा था, "बाबा ये हिंदू क्या होता है ?" बाबा हँस दिए थे बस। दूसरे दिन यही बात मैंने जुबेर को बताई थी, तो उसने कहा था, "तू जानता है, मेरे अब्बा मुसलमान हैं और कहते हैं कि मैं भी मुसलमान हूँ।"अभी बड़े दिन पर डॉ सच्चिदानंद&nbsp...
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--तन्त्र अब खटक रहा है।सुदामा भटक रहा है।।--कंस हो गये कृष्ण आज,मक्कारी से चल रहा काज,भक्षक बन बैठे यहाँ बाज,महिलाओं की लुट रही लाज,तन्त्र अब खटक रहा है।सुदामा भटक रहा है।।--जहाँ कमाई हो हराम कीलूट वहाँ है राम नाम की,महफिल सजती सिर्फ जाम कीबोली लगती जहाँ चाम क...
kumarendra singh sengar
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बीते दिनों से छुटकारा पाना आसान नहीं होता है. उन दिनों की बातें, उनकी यादें किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाती हैं. ये यादें कभी हँसाती हैं तो कभी रुलाती हैं. दिल-दिमाग खूब कोशिश करें कि पुरानी बातों को याद न किया जाये मगर कोई न कोई घटना ऐसी हो ही जाती है कि इन या...
Saransh Sagar
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नाम - कुशमा गोसाईं.., 10 साल का बेटा - रामू गोसाईं..,चारों थैलों का वजन 105 किलो.. आज दोपहर करीब 3:00 बजे जब मैं "गुलधर" रेलवे स्टेशन पर उतरा तो सहसा कानों में एक आवाज सुनाई दी--"भैया ई थैला उठवा दीजिए तो "।  पीछे मुड़कर देखा तो लगभग 30 साल की एक महिला खड़ी थ...
Saransh Sagar
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साल २०१५ में यही कोई नवम्बर,अक्टूबर का महिना होगा ! परी-चौक ग्रेटर नॉएडा का लोकप्रिय स्थान है वहां जाने के लिए ऑटो का इंतजार कर रहा था होस्टल से ! ताकि छुट्टी में घर जा सकू ! रात काफी थी तो कोई ऑटो वाला दिखा नही लेकिन मै अपना सामान लेकर के पैदल ही चल पड़ा सोचा शारदा...
Rajeev Upadhyay
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मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने, मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने? काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है, मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने? मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले?&...