ब्लॉगसेतु

kumarendra singh sengar
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अपनी उम्र के चार दशक गुजारने के बाद आत्मकथा लिखना हुआ. इसमें अपने जीवन के चालीस वर्षों की वह कहानी प्रस्तुत की गई जिसे हमने अपनी दृष्टि से देखा और महसूस किया. कुछ सच्ची कुछ झूठी के रूप में आत्मकथा कम अपनी जीवन-दृष्टि ही सामने आई. व्यावसायिक रूप से, प्रकाशन की आर्थि...
Bharat Tiwari
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उस दिन शायद पहली बार मैंने अपने पिताजी से पूछा था, "बाबा ये हिंदू क्या होता है ?" बाबा हँस दिए थे बस। दूसरे दिन यही बात मैंने जुबेर को बताई थी, तो उसने कहा था, "तू जानता है, मेरे अब्बा मुसलमान हैं और कहते हैं कि मैं भी मुसलमान हूँ।"अभी बड़े दिन पर डॉ सच्चिदानंद&nbsp...
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--तन्त्र अब खटक रहा है।सुदामा भटक रहा है।।--कंस हो गये कृष्ण आज,मक्कारी से चल रहा काज,भक्षक बन बैठे यहाँ बाज,महिलाओं की लुट रही लाज,तन्त्र अब खटक रहा है।सुदामा भटक रहा है।।--जहाँ कमाई हो हराम कीलूट वहाँ है राम नाम की,महफिल सजती सिर्फ जाम कीबोली लगती जहाँ चाम क...
kumarendra singh sengar
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बीते दिनों से छुटकारा पाना आसान नहीं होता है. उन दिनों की बातें, उनकी यादें किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाती हैं. ये यादें कभी हँसाती हैं तो कभी रुलाती हैं. दिल-दिमाग खूब कोशिश करें कि पुरानी बातों को याद न किया जाये मगर कोई न कोई घटना ऐसी हो ही जाती है कि इन या...
Saransh Sagar
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नाम - कुशमा गोसाईं.., 10 साल का बेटा - रामू गोसाईं..,चारों थैलों का वजन 105 किलो.. आज दोपहर करीब 3:00 बजे जब मैं "गुलधर" रेलवे स्टेशन पर उतरा तो सहसा कानों में एक आवाज सुनाई दी--"भैया ई थैला उठवा दीजिए तो "।  पीछे मुड़कर देखा तो लगभग 30 साल की एक महिला खड़ी थ...
Saransh Sagar
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साल २०१५ में यही कोई नवम्बर,अक्टूबर का महिना होगा ! परी-चौक ग्रेटर नॉएडा का लोकप्रिय स्थान है वहां जाने के लिए ऑटो का इंतजार कर रहा था होस्टल से ! ताकि छुट्टी में घर जा सकू ! रात काफी थी तो कोई ऑटो वाला दिखा नही लेकिन मै अपना सामान लेकर के पैदल ही चल पड़ा सोचा शारदा...
Rajeev Upadhyay
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मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने, मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने? काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है, मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने? मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले?&...
kumarendra singh sengar
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आखिरकार लम्बे इंतजार के बाद कुछ सच्ची कुछ झूठी का प्रकाशन हो ही गया. विगत दो-तीन वर्षों से लगातार प्रकाशन की, लेखन की, संपादन की स्थिति में होने के कारण हमारा यह ड्रीम प्रोजेक्ट थमा हुआ था. रुका हुआ नहीं कह सकते क्योंकि इस पर लगातार काम चल रहा था. जब स्थिति खुद पर...
Saransh Sagar
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अधिकांशतः अपने प्रत्येक मधुर व कटु अनुभव को इस प्रकार के शब्द व भाव देने का प्रयास करता हूं कि घटना आप तक यथावत पहुंचे... अभी दिल्ली से घर के लिए निकला हूं, टिकट लेने के लिए लाइन में लगा हुआ था, आजकल बुकिंग क्लर्क के नाम की नेमप्लेट सामने रखी होती है, दिनेश नाम क...
Yashoda Agrawal
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पत्थर मिलेंगे टूटे, तन्हाइयां मिलेंगीमासूम खंडहरों में, परछाइयां मिलेंगीइंसान की गली से, इंसानियत नदारदमासूम अधखिली से, अमराइयां मिलेंगीकुछ चूड़ियों की किरचें, कुछ आंसुओं के धब्बेजालों से कुछ लटकती, रुस्वाइयां मिलेंगीबाज़ार में हैं मिलते, ताली बजाने वालेपैसे नहीं जो...