ब्लॉगसेतु

kumarendra singh sengar
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मुलाकात जब पहली बार हुई तो न फिल्मों की तरह पहली नजर वाला आकर्षण उभरा, न पहली नजर के प्रेम जैसा कुछ एहसास हुआ. कुछ दिनों की कुछ मुलाकातें जो हँसी-मजाक के साथ ख़तम हो गईं. हम दोनों की अपनी-अपनी राहें थीं, अध्ययन वालीं, सो आगे चल दिए. पढ़ने को, एक ठो डिग्री लेने को. पर...
Yashoda Agrawal
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वंचना है चाँदनी सित,झूठ वह आकाश का निरवधि, गहन विस्तार-शिशिर की राका-निशा की शान्ति है निस्सार!दूर वह सब शान्ति, वह सित भव्यता,वह शून्यता के अवलेप का प्रस्तार-इधर-केवल झलमलाते चेतहर,दुर्धर कुहासे का हलाहल-स्निग्ध मुट्ठी मेंसिहरते-से, पंगु, टुंडे, नग्न, बुच्चे, दईमा...
PRABHAT KUMAR
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कभी-कभी बात समझ आती है तो मैं सही सोचता हूँ। लेकिन यह तब होता है जब मैं मौत के करीब होता हूँ। सबसे परेशान होता हूँ। मैं ही मैं होता हूँ।लेकिन बला टलते ही भूल जाता हूँ कि क्या सोचा था।जब परेशानियां हावी होती हैं, सब हाय-हाय कर रहे होते हैं। मैं खाट पर होता हूँ। सोच...
 पोस्ट लेवल : जीवन का सच चिंतन
kumarendra singh sengar
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रात गहरा चुकी थी और हम मित्रों द्वारा बातों के बताशे बनाने भी बन्द किये जा चुके थे, सो नींद के आगोश में मजबूरीवश जाना ही था. सभी ने विदा ली और अपने-अपने कमरों की ओर चल दिये. ठण्ड के दिन होने के कारण रजाई में घुसते ही नींद ने अपना असर दिखाना शुरू किया. लेटते ही नींद...
Saransh Sagar
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 ये कहानी कोई काल्पनिक नही बल्कि सत्य घटना पर आधारित है !! आज से लगभग ५ वर्ष पूर्व दिल्ली के सरकारी स्कूल ( न्यू कोंडली ) में महेश नाम का विद्यार्थी पढ़ता था ! 8.4 Cgp से उसने प्राइवेट स्कूल से दसवी कक्षा की थी जिसके कारण उसे सरकारी स्कूल में दाखिला मिल गया ! श...
Yashoda Agrawal
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ऊपर फैला है आकाश, भरा तारों से- अज्ञेयऊपर फैला है आकाश,भरा तारों सेभार-मुक्त से तिर जाते हैं पंछी डैने बिना फैलाये । जी होता है मैं सहसा गा उठूँ उमगते स्वरजो कभी नहीं भीतर से फूटेकभी नहीं जो मैं ने -कहीं किसी ने - गाये ।किन्तु अधूरा है आकाश हवा...
Sanjay  Grover
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कृश्न चंदर की एक कहानी थी ‘गड्ढा’। एक आदमी ऐसे गहरे गड्ढे में गिर जाता हैं जहां से दूसरों की मदद के बिना निकलना संभव नहीं है। लोग आते हैं, तरह-तरह की बातें करते हैं, अपना टाइम पास करते हैं, मनोरंजन करते हैं, सुबह से शाम हो जाती है पर कोई उसे गड्ढे से निकालने का नाम...
Sanjay  Grover
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ग़ज़ल created by Sanjay Groverसच में या अफ़साने मेंमंटो पागलखाने मेंमंटो, तेरे और मेरेहै क्या फ़र्क़ ज़माने मेंसच लोगों को भाता हैंसिर्फ़ रहे जब गाने मेंझूठ को मैंने खोया हैअपने सच को पाने मेंहर पगले का नाम लिखासच के दाने-दाने में-संजय ग्रोवर02-10-2018
Sanjay  Grover
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Photo By Sanjay Groverग़ज़लआओ सच बोलेंदुनिया को खोलेंझूठा हंसने सेबेहतर है रो लेंपांच बरस ये, वोइक जैसा बोलेंअपना ही चेहराक्यों ना ख़ुद धो लेंराजा की तारीफ़जो पन्ना खोलें !क्या कबीर मंटो-किस मुह से बोलें !सबको उठना है-सब राजा हो लें ?वे जो थे वो थेहम भी हम हो लें बैन...
PRABHAT KUMAR
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मैं सच में कमाल का इंसान हूं। एक इंसान जिसके लिए नहाना अन्य दूसरे चीजों से भी ज्यादा मायने रखता है। कुछ वाकया बताते हैं....2010 के आस पास की बात है, अपने मित्रों के संग अमृतसर, वाघा बॉर्डर, जलियावालाबाग तक घूमने की योजना बनी। सामान्य यानी कि लोकल डिब्बे में बैठकर स...