ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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खिड़कियों पर पर्दे डालकर इस लाल अँधेरे में बैठे बहुत देर से सोच रहा हूँ। कई सारी बातें चलकर थक चुकी हैं। कुछ मेरे बगल ही बैठी हैं। कुछ सामने एक बंद किताब की ज़िल्द के अंदर छिपी हुई हैं। डायरी लिखना एक दम बंद होने की कगार पर है। लिखने का मन होते हुए भी पूरे दिन की भाग...
Shachinder Arya
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उसने कभी सोचा नहीं था के आज इस बरसात के बाद इस ढलती शाम में अचानक वह फ़िर दिख जाएगी। वह अभी भी साँवली थी। उसे यह रंग सबसे जादा पसंद था। अपना नहीं, उस लड़की का। जैसे अभी भूरे बादलों ने उजले आसमान को ढक लिया हो। वह अपने दिल की धड़कनों में ढलते हुए सूरज की तरह धीरे-धीरे...
Shachinder Arya
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कानपुर कभी किसी याद का हिस्सा नहीं रहा। सिर्फ़ एक छोटी-सी धुँधली तस्वीर में दादी के चले जाने के बाद, रात दो बजे कानपुर से लखनऊ की तरफ़ भागती रोडवेज़ बस में बोनट पर गुजरी असहाय यात्रा के कुछ याद नहीं। उसमें कानपुर कहीं नहीं है। सिर्फ़ लंबी काली सड़कें, घूमते पहिये और चमक...
Shachinder Arya
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एकबार एक कहानी में एक स्टेशन मास्टर होते हैं। उनकी उमर इतनी लगती कि लगता है अभी कल ही नौकरी से जा रहे हैं। पर सालों से कहीं गए नहीं थे। तब हमारे पास बुलेट ट्रेन का सपना दिखाने वाले जादूगर नहीं थे। यह तब की बात है जब हमारे पास ठीक-ठाक रेलगाड़ी के डिब्बे बनाने वाले का...
Shachinder Arya
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जबसे वह चला है, तब से अब तक ट्रेन में सब सो चुके होंगे। वह भी गर्दन एक तरफ़ कर यहाँ के बारे में सोच-सोच उकता गया होगा। नींद अभी सिराहने से गुज़र वापस लौटने की तय्यारी में होगी। कि तभी एक हाथ उसके पास आकर, किनारे वाली बत्ती को जलाने वाला बटन ढूँढ रहा होगा। उन हाथों...
Shachinder Arya
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इन बातों को आज इतने महीने पहले ही ‘ड्राफ़्ट’ करके ‘शेड्यूल’ कर रहा हूँ। तीन चार सपने तरतीब से लगा दिये हैं। के आगे वाले दिनों में कहीं इसे लगाना रह न जाये। भूलने वाला प्राणी नहीं हूँ, फ़िर भी.. मन कर रहा है। तारीख़ वही है जब हम सच में चारबाग़ स्टेशन के लिए चल दिये होंग...
Shachinder Arya
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किसी खाली सुनसान स्टेशन के ‘प्लेटफ़ॉर्म’ की तरहउस अकेलेपन में इंतज़ार कर देखना चाहता हूँकैसा हो जाता होगा वह जब कोई नहीं होता होगाकोई एक आवाज़ भी नहींकहीं कोई दिख नहीं पड़ता होगाबस होती होगी अंदर तक उतरती खामोशीदूर तक घुप्प अँधेरे सा इंतज़ार करता ऊँघता ऊबताकि इस अँधेरे...