ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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नवंबर आ गया है और कल से ठंड भी कुछ बढ़ गयी है। कश्मीर में बर्फ़ गिरी है। बर्फ़ इंडिया गेट पर उतनी ही अजीब होगी जैसे कि कल एककाँग्रेसी नेता के अपनी लड़कियों को बोझ बताने वाले हलफ़नामे पर रोष प्रकट करते राम माधव थे। इधर कई दिनों से गायब था। बीच में कईबार लौटने की कोशिश भी...
Shachinder Arya
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न लिखना पाना किसी याद में रुक जाना है। इसे टाल देना, उसमें ही कहीं छिप जाना है। लगता है, इधर ऐसे ही छिप गया हूँ। यहाँ न आने के पीछे कई गैर-ज़रूरी बातें रही होंगी। पर उनका होना कतई इसलिए गैर-ज़रूरी नहीं रहा होगा। उनकी कलई खुलते-खुलते देर लगती है, पर पता लग जाता है। इस...
Shachinder Arya
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तारीख़ अट्ठारह सितंबर। साल दो हज़ार चौदह। एक साल और बीत गया। इसे ‘जुड़ गया’, कहने का मन था। फ़िर भी क्यों नहीं कह पाया, पता नहीं। इस दुनिया में हमारी भी गलियाँ, कई खिड़कियों से गुजरते दृश्यों को ‘स्थिर’ कर सामने रख देती होंगी। किसी विचार के भीतर घूमते, किसी याद को याद क...
Shachinder Arya
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असल में हम सब सपनों में जीने वाले लोग हैं। हमारी ज़िन्दगी ऐसा नहीं है, ख़ूबसूरत नहीं है। ये भी नहीं के उसमे रंग कुछ कम हैं। चटकीले फिरोज़ी से लेकर दुधिया नीले तक। कोमलतम स्पर्शों की छुअन दिल में मौके बे-मौके धड़कन की तरह झिलमिलाती रहती हैं। आवाज़ें भी जेब भर-भर हैं। दूर...
Shachinder Arya
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तो उस सड़क पर कोई नहीं है। सिर्फ़ हम दोनों है। क्योंकि यह सपना हम दोनों का है। वह सड़क है भी या नहीं, पता नहीं। पर दिख सड़क जैसी ही रही है। हो सकता है हम जैसे-जैसे आगे बढ़ते जा रहे हों, वह पीछे से गायब होती हमारी आँखों में समाती जा रही हो। रात के कितने बज रहे हैं, पता न...
Shachinder Arya
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इन बातों को आज इतने महीने पहले ही ‘ड्राफ़्ट’ करके ‘शेड्यूल’ कर रहा हूँ। तीन चार सपने तरतीब से लगा दिये हैं। के आगे वाले दिनों में कहीं इसे लगाना रह न जाये। भूलने वाला प्राणी नहीं हूँ, फ़िर भी.. मन कर रहा है। तारीख़ वही है जब हम सच में चारबाग़ स्टेशन के लिए चल दिये होंग...
Shachinder Arya
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कभी-कभी लगता है दिल्ली पल-पल पीछे छूट रही है। ख़ुद कभी नहीं सोच पाता के कहाँ से चलकर किधर आगया हूँ। कहीं के लिए चला भी हूँ या हम वहीं पृथ्वी की तरह अपने अक्षों पर परिक्रमा कर रहे हैं। हो सकता है यह थोड़ी देर के लिए हुआ मतिभ्रम है, जो कहीं नहीं रहने देता। बस भगाता रहत...
Shachinder Arya
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रात बारह बजकर एक मिनट। घंटी बजी। उधर से फ़ोन नहीं आया। तुम सो गयी हो। समझ नहीं पा रहा, नींद आ रही है या आँखें ऐसे ही भारी हो रही हैं। पलकें घंटा भर पहले भी ऐसी थीं और अभी भी ऐसी ही हैं। नींद गायब है। सपने में भी नहीं हूँ के तुम तक पहुँच जाऊँ। करीब से हम दोनों, एक...
Shachinder Arya
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इन सालों में इतना ख़राब कभी नहीं लिखा। लिखना ताकत देता है। यह बिखरने से बचाता है। टूटने से लगातार ख़राब दिनों रातों से निकालता रहा है। ऐसे तोड़ता नहीं है। पर न मालुम उस रात क्या हो गया। जिसे जैसे कहना था, उसके पीछे चिपका श्लेष, अपने अर्थों में उन ध्वनियों को ले गया, ज...
Shachinder Arya
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उधर तुम होती हो। इधर मैं होता हूँ। और दोनों तरफ़ होती हैं हमारी आवाज़ें। आवाज़ें दोनों ओर आरपार होती जाती हैं। इन गुज़रती आवाज़ों में होती है, हमारी साँसों की धड़कनें। धड़कता मन। उनमें बहता ख़ून। वह खून जो दिल में धड़कता है। धड़कता है सपनों में। यह दिन। यह शाम। यह रात। ऐसे ह...