ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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सड़क। उसका किनारा। किसी सागर से कम उथला नहीं। बस दिखाई नहीं देता। बस कभी-कभी महसूस होता है। जैसे इन शामों को। जब ठंड थोड़ी बढ़ रही होती है। सूरज कहीं दिख नहीं रहा होता। अँधेरा उन रौशनियों के गायब हो जाने के इंतज़ार में कहीं किसी कोने में घात लगाये बैठा रहता है। दिल्ली...
Shachinder Arya
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दिन पता नहीं कैसे बीतते जा रहे हैं। करने को कुछ है ही नहीं जैसे। खाली से। ठंडे से। दिन अब छोटे होने लगे हैं। तीन बजने के साथ जैसे गायब से। उबासी नींद के साथ बुलाती है। पर नाम नहीं करता। रज़ाई ठंड से भी ठंडी कमरे में पड़ी रहती है। पैर भी ठंडे रहने लगे हैं। फ़िर नीचे सा...
Shachinder Arya
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जीशान। उसका नाम जीशान है। कभी नाम का मतलब नहीं पूछा। शायद उसे मालुम भी न हो। क्लास में पढ़ने वाले और भी बच्चे हैं पर पता नहीं क्यों इस पर आकर ठहर जाता हूँ। शक्ल से बिलकुल मासूम सा। पढ़ने से जी न चुराने वाला। रोज़ स्कूल आता। पर सितम्बर के बाद इसका आना एकदम से कम हो गया...
Shachinder Arya
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जबरदस्ती लिखने बैठ गया हूँ। मन बिलकुल भी नहीं हो रहा। फिर भी। आसमान में बादल हैं। शाम ख़ूब हवा चल रही थी। पता नहीं किस दिशा से आती जाती रही। बार-बार फ़ोन लेकर कमरे में आता। फ़िर थोड़ी देर में बाहर निकलता। लगता आवाज़ कट रही है। ठीक से सुनायी नहीं दे रही। फ़िर बाहर रखी कुर...
Shachinder Arya
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सारे रंग उड़ गए हैं। सब सफ़ेद रंग बन गए हैं। बिन लकीर के। बिन किसी छाया के। किसी पेड़ में कोई हरियाली नहीं। किसी आसमान में कोई नीलापन नहीं। चाँद भी नीली रोशनी सा नहीं। या उन सभी को एक प्लेट में घोलकर अपने ‘ब्लॉग’ की दीवार पर चिपका लिया है। पता नहीं। पर सच में अभी वह क...
Shachinder Arya
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ये कोई बहुत अच्छ दिन नहीं हैं। बस बराबर इनसे बचने की कोशिश में घुलता जा रहा हूँ जैसे। आँखों के सामने बीतते दिन अंदर-ही-अंदर पता नहीं क्या करे जा रहे हैं। कहीं मन न लगना इसकी पहली निशानदेही थी। कई-कई महीनों पहले। अनमने रहने का मन नहीं करता। फ़िरभी इसी में बने हुए हैं...