ब्लॉगसेतु

सुशील बाकलीवाल
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             इस दुनिया में हमारा आना अपने माता-पिता के कारण होता है और उनसे जुडे अन्य दूसरे रिश्ते स्वतः हमारे साथ भी जुड जाते हैं, वे हमें अच्छे लगें या नहीं ये अलग बात है किंतु हमें उन्हें अनिवार्य रुप से जीवन भर...
jaikrishnarai tushar
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साहित्य समाज के पीछे लंगड़ाता हुआ चल रहा है -                                                   रवीन्द्र कालिया साहित्यिक आयोजनमेर...
kumarendra singh sengar
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आज की पोस्ट रिश्तों पर लिखने की सोच रहे थे मगर लगा कि रिश्तों की परिभाषा है क्या? जो हम आपसी संबंधों के द्वारा निश्चित कर देते हैं, क्या वही रिश्ते कहलाते हैं? क्या रिश्तों के लिए आपस में किसी तरह का सम्बन्ध होना आवश्यक है? दो व्यक्तियों के बीच की दोस्ती को क्या कह...
kumarendra singh sengar
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जिस जेएनयू मारपीट विवाद को सरकार, शासन, प्रशासन, मीडिया शांत नहीं कर पा रहे थे उसे एक झटके में फिल्म अभिनेत्री दीपिका ने खामोश कर दिया. जेएनयू में हुए मारपीट सम्बन्धी विवाद के बाद दीपिका कथित टुकड़े गैंग से मिलने विश्वविद्यालय पहुँच गईं. दीपिका का वहाँ पहुँचना हुआ न...
kumarendra singh sengar
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लोगों का उत्साह, लोगों की उमंग, लोगों की आकुलता देखकर लग रहा है जैसे उन सभी लोगों के लिए जाने वाला साल सकारात्मक रहा होगा या फिर उनके द्वारा अपने आपसे सोचे गए कार्य अधिकतम रूप में सफलता को प्राप्त किये होंगे. यदि ऐसा नहीं है तो फिर नए साल के स्वागत के लिए, उसके आने...
Sanjay  Grover
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हमारे घर की बिजली अकसर ख़राब हो जाती थी।कई बार तो एक-एक हफ़्ते ख़राब रहती थी।जबकि पड़ोस के बाक़ी घरों की बिजली आ रही होती थी।उसका कारण था। हमारे पिताजी के संबंध और आना-जाना वैसे तो बहुत लोगों से था मगर न तो किसी दबंग और बदमाश सेे संबंध रखते थे न ख़ुद बदमाशी करते...
 पोस्ट लेवल : न्याय समझ society समाज justice
kumarendra singh sengar
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आज के दौर में जबकि एक तरफ संवैधानिक रूप से चलने की बात की जाती है उस समय में संवैधानिक क्या है, इसे लेकर भी संशय बना हुआ है. हैदराबाद की जघन्य घटना के बाद आम जनमानस में आक्रोश बना हुआ था और आरोपियों को जनता के हवाले करके, जनता के द्वारा हिसाब बराबर किये जाने की आवा...
kumarendra singh sengar
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हैदराबाद में चिकित्सक महिला के साथ हुई वीभत्स वारदात के बाद पूरे देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है. इस बहस के केन्द्र में जहाँ महिलाओं की सुरक्षा है, शासन-प्रशासन की कानून व्यवस्था है वहीं इसके साथ-साथ मजहब विशेष के पुरुषों द्वारा ऐसे जघन्...
अनीता सैनी
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 घटनाएँ लम्बी कतार में बुर्क़ा पहने  सांत्वना की  प्रतीक्षा में लाचार बन  खड़ी थीं | देखते ही देखते दूब के नाल-सी बेबस कतार  और बढ़ रही थी |समय का हाल बहुत बुरा था 1920 का था अंतिम पड़ाव&nb...
kumarendra singh sengar
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बेटियों के साथ होने वाली किसी भी घटना के बाद एक आम पोस्ट आती है कि बेटियों के बजाय बेटों को शिक्षा दें कि वे स्त्री को एक इन्सान समझें. हम बराबर और बार-बार कहते हैं कि समाज में स्त्री-पुरुष का, लड़के-लड़की का, बेटे-बेटी का भेद करने से कभी कोई सुधार नहीं आने वाला. बे...