ब्लॉगसेतु

ज्योति  देहलीवाल
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इस कलयुग में भी ज्यादातर इंसान कुछ अच्छा करना चाहते हैं ताकि समाज का कुछ भला हो, वे किसी के आँसू पोंछ सके। लेकिन जवानी में रोजी-रोटी कमाने से फ़ुरसत नहीं मिलती और बुढ़ापे में जर्जर काया एवं सीमित संसाधनों के कारण क्या करें ये इंसान समझ नहीं पाता! आइए, आज मैं आपको म...
विजय राजबली माथुर
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स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )    संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
Sanjay  Grover
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जब आपको मरीज़ की जान की चिंता होती है तो आपको इसकी परवाह नहीं होती कि वह होमियोपैथी से ठीक होगा, ऐलोपैथी से होगा कि आयुर्वेद से होगा कि और किसी तरीके से होगा। आप यथासंभव कोशिश करते हैं, जितना जेब अलाउ करती है, पैसा ख़र्च करते हैं, कर्ज़ भी ले लेते हैं, भाग-दौड़ करते ह...
ज्योति  देहलीवाल
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                                     आदित्य तिवारी बिन्नी के साथ आज समाजसेवा का मतलब, नेतागिरी करना हो गया है। आम इंसान सोचता है कि वो तो समाजसेवा कर ही नहीं सकता। स...
Kajal Kumar
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मेरे पड़ोसी का बेटा बचपन से ही बड़ा आदमी बनने के ख़्वाब देखा करता था. उसकी चाह पूरी होती भी दि‍खने लगी जब पढ़ाई-लि‍खाई में उसकी कोई रूचि‍ न रही, लेकि‍न बातों का पहलवान नि‍कला. और आख़ि‍र वो एक दि‍न भी आ ही गया जब ‘सीधे बारहवीं करें’ टाइप एक कॉलेज से उसके लि‍ए ...
Madabhushi Rangraj  Iyengar
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नाले का पुल.बात आश्चर्यजनक तो है पर सच भी है.यह दर्शाता है कि गाँव- शहरों में सुविधाओं के साथ सामाजिक प्रगति किस तरह से जुड़ी है और वहाँ के बाशिंदों को इसका किचतना फायदा – नुकसान होता है. इस बात का भी इजहार करता है कि ये सुविधाएं सामाजिक उत्थान व पतन में बहुत ही भा...