ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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मन भाग रहा है। पता नहीं क्या है, जिसके न होने से लिख नहीं पा रहा। अजीब-सी स्थिति है। कभी मन करता है, एक एक अधूरी पोस्ट खोलकर उसे पूरा करता जाऊँ। पर नहीं कर पाया। वहाँ से वर्ड में लिखने बैठा हूँ तो अब बाहर निकल कर घूम आने को जी चाह रहा है। शुक्रवार शाम पौने सात बजे...
Shachinder Arya
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शहरों में जो लोग अपने सपनों के साथ दाखिल होते हैं, कभी कोई उनसे उनके सपनों के बारे में नहीं पूछता। उन्हे कहीं कोई ऐसा भी नहीं मिलता, जो उन अधूरे सपनों को किसी किताब में लिखकर, किसी जगह कतरन बनाकर लिख अपने पास रख ले। कभी कोई होता, जो उस किताब को पढ़कर अपने जैसे सपने...
Shachinder Arya
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तबीयत कल के मुक़ाबले काफ़ी दुरुस्त है। बस अब मन ठीक करना रह गया है। अभी इतनी उम्र नहीं हुई पर बचपन की यादें अब गड्ड-मड्ड होने लगी हैं। मुझे बचपन की कहानियाँ पढ़ना पसंद हैं, जैसी उदय प्रकाश ने लिखी हैं। तिरीछ या डिबिया या मौसा जी या ऐसी बहुत। शायद ख़ुद की नहीं लिख पाया...
Shachinder Arya
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सब कुछ वैसा ही है, जैसा कभी नहीं सोचा था। इस पंक्ति के बाद एकदम से सुन्न हो गया। आगे क्या कहूँ? कुछ कहने के लिए हैं भी या ऐसे ही दोहराव में हम अपने बिगड़ने को देखते रहते हैं। कई सारी बातें हैं, जिन्हे कहना है पर समेटने का सलीका थोड़ा भूलता गया हूँ। अभी खिड़की के बाहर...
Shachinder Arya
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हम सब सपनों में रहने वाले लोग हैं। सपने देखते हैं। और चुप सो रहते हैं। उनमें कहीं कोई दीमक घुसने नहीं देते। बक्से के सबसे नीचे वाली तरी में छिपाये रहते हैं। कहीं कोई देख न ले। उसमें किसी की बेवजह आहट कोई खलल न डाल दे। सब वैसा का वैसा बना रहे जैसे सपनों में देखा है।...
Shachinder Arya
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अकेले खाली कमरे में बैठे रहने का सुख  क्या होता है, इसे भरे हुए लोग कभी नहीं जान पाएंगे। उनकी उन दिवारों पर घूमती छिपकलियों से कभी बात नहीं होगी। वे कभी अकेले नहीं होना चाहेंगे। वे कभी छत से झड़ते पलस्तर को ‘स्लो मोशन’ में देख लेने वाली आँखों वाले नहीं हो सकते।...
Shachinder Arya
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किसी का शहर छोड़कर जाना कैसा है? हमेशा के लिए। कभी लौटकर वापस न आने के लिए। कई दोस्त हैं जो अब यहाँ नहीं हैं। सब बारी-बारी अपने सपनों को समेटकर यहाँ से चल दिये। जिन बक्सों में वह इन्हे भरकर लाये थे, उनमें क्या ले गए होंगे, पता नहीं। उन्होने किसी को भी नहीं बताया। शा...
Shachinder Arya
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असल में हम सब सपनों में जीने वाले लोग हैं। हमारी ज़िन्दगी ऐसा नहीं है, ख़ूबसूरत नहीं है। ये भी नहीं के उसमे रंग कुछ कम हैं। चटकीले फिरोज़ी से लेकर दुधिया नीले तक। कोमलतम स्पर्शों की छुअन दिल में मौके बे-मौके धड़कन की तरह झिलमिलाती रहती हैं। आवाज़ें भी जेब भर-भर हैं। दूर...
Shachinder Arya
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हम लोग इंतज़ार कर रहे थे शायद ऐसे ही किसी दिन का । ऐसी ही मुलाक़ात का। राकेश इस बार दस दिन लिए दिल्ली आया। दिवाली के दो दिन पहले। पर बे-तक्कलुफ़ होकर उस इत्मीनान से अपने-अपने हिस्से कभी खोल ही नहीं पाये। एक दूसरे से कुछ कह नहीं पाये थे। तय हुआ सब इस शनिवार इकट्ठे हो र...