ब्लॉगसेतु

अनीता सैनी
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 स्वयं का नाम सुना होगा सरहद ने जब  मोरनी-सी मन ही मन हर्षाई होगी।अस्तित्त्व अदृश्य पानी की परत-सा पायाभाग्य थाम अँजुली में इतराई होगी। मंशा मानव की झलकी होगीआँखों से जबआँचल से लिपटी अपने बहुत रोई होगी।आँशु पोंछें होगें जब सैनिक ने उसके प्रीत में बाव...
 पोस्ट लेवल : सरहद सामाजिक सरोकार
अनीता सैनी
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[चित्र गूगल से: सभार ]                                वह देह से एक औरत थी              उसने कहा पत्नी है मेरी वह बच्चे-सी मासूम थी उसन...
अनीता सैनी
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                                                               [ चित्रगूगल:सभार]     &nbsp...
अनीता सैनी
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                                           समय की दीवार पर दरारें पड़ चुकीं थींसिमटने लगा था जन-जीवनधीरे-धीरे इंसान अपना संयम खो रहा था   मान...
अनीता सैनी
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 स्वयं की सार्थकता दर्शाते पंखविहीन उड़ान भरना चाहते हैं।   दुविधा में फिरते मारे-मारे   बीनते  रुखी-सूखी डाले समय की सभ्यता के जंगल में विचरते लिबास बदलते वे बहुरुपिये बहुतेरे हैं। जीवन-वृक्ष की काटते टहनियाँ&...
अनीता सैनी
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सत्ता की भूख से भरी थी वह मिट्टी तब खिले थे परोपकार के सुंदर सुमन। सेकत गढ़ती उन्हें हरसिंगार स्वरुप में। विलक्षण प्रभाव देख  दहलती थी दुनिया। क्षणभंगुर नहीं थे वे अनंत काल तक हृदय पर शीतल पवन-सा विचरते विच...
अनीता सैनी
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उसके हृदय में दरारें थीं जिससे सांसें फटकन-सी लगीं। पीड़ा आँगन में पसरी थी अदृश्य याचक की तरह। आँखें झुकाए नमी से हृदय की फटन छिपा रहा था वह।  कभी स्वाभिमान के मारे शब्दों से ढाक रहा था उन्हें। बिवाई समझ हृदय में मोम गलाकर भरा करती थी मैं।&n...
अनीता सैनी
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उल्लास से कहता उजाले की दहलीज़ पर।  स्वतंत्र चित्त से जीवन की उस ढलान पर।  झोली फैलाए याचक याचना की उम्मीद पर। आँखों की झपकी भर अस्मिता उधार माँगता।  न ही अंधकार का पहरा था न ही दीन था।  अनदेखे रुप में काँटों से  करता मिन्नते।...
अनीता सैनी
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 कल 'एहसास के गुँचे' मेरा प्रथम काव्य-संग्रह छपकर मेरे हाथ में पुस्तक के रूप में आया तो ख़ुशी का ठिकाना न रहा। यह ख़ुशी आपके साथ साझा करते हुए भावातिरेक से आल्हादित हूँ। ब्लॉग लिखते-लिखते ख़याल आया कि लेखन को पुस्तक का रूप दिया जाय और अपने सृजन को कॉपी राइट...
 पोस्ट लेवल : सामाजिक सरोकार
अनीता सैनी
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सागर के सूनेपन में उलझन है ज्वार-भाटा में दुःख फूट रहा। मर्मान्तक वेदना लिखती क़लम जाने मन मसी का क्यों टूट रहा !पुरवाई  फूल-पत्तों संग गाती है बँधन खुशबू का छूट रहा।  चाँद-तारों के साथ नीलांबर जाने भाग्य धरा का क्यों फूट रहा !&nbs...