ब्लॉगसेतु

अनीता सैनी
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तुम्हें ये जो पूर्णता का बोधमन ही मन हर्षाए जा रहा है ये अनभिज्ञता  है तुम्हारी  थकान नीरसता छिछलापन है तुम्हारे मन-मस्तिष्क का  उत्सुकता उत्साह पर अनचाहा विराम चिन्ह है अपूर्णता अज्ञानता मिथ्या है जो    झाँकतीं है समझ क...
अनीता सैनी
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जब भी मिलती हूँ मैं शब्दों से परे एक-एक की ख़ामोशी आँखों के झिलमिलाते पानी में पढ़ती हूँ।कोरी क़िताब के सफ़ेद पन्ने पन्नों में हृदय के कोमल भाव भावों में  बिखरे मोती शब्दों से चुनती हूँ।सूरज की रोशनी चाँद की आभा कृ...
अनीता सैनी
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मैं और मेरा मन सभ्यता के ऐंद्रजालिक अरण्य में भटके नहीं विचरण पर थे  दृश्य कुछ जाने-पहचाने  सिमटी-सी भोर लीलाएँ लीन  बुझते तारे  प्रभात आगमन मैं मौन मन लताओं में उलझा  अस्तित्व ढूँढ़ता सुगबुगाया निश्छल प्रकृति क...
अनीता सैनी
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गिरोह गिरोह बस जुबाँ पर एक ही नाम गिरोह कौन बन&#2...
अनीता सैनी
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मर्तबान को सहेज रखती थी रसोई में मख़मली यादें इकट्ठा करती थी उसमें मैं जब भी ढक्कन हटाकर मिलती उन  से उसी पल से जुड़ जाती अतीत के लम्हों से चिल्लर जैसे खनकतीं थीं वे यादें दिल में एक जाने-पहचाने एहसास के साथ  उसे छूने पर माँ के...
अनीता सैनी
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 समय को समझ के फेर में उलझाते हुए हृदय की अगन को सुलगाते  रहना है। शालीनता के मुखौटे की आड़ में ईर्ष्या  के छाले शब्दों पर जड़ते जाना है। विचित्र खेल है परंतु खेलते  जाना खेलने वाला हर व्यक्ति को विजेता कहलाना है। आम...
 पोस्ट लेवल : सामाजिक सरोकार
अनीता सैनी
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आँधी को देखकर अक्सर मैं सहम-सी जाया करती थी धूल के कण आँखों में तकलीफ़ बहुत देते न चाहते  हुए भी वे आँखों में ही समा जाते समय का फेर ही था कि आँधी के बवंडर मे छाए अँधरे में भी किताबें ही थामे रखती थी हँसने वाले हँसते बहुत थेविचारों...
अनीता सैनी
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 मोती-सी बरसीं बूँदें धरा के आँचल पर पात प्रीत के धोती पग-पग पर बरसात पल्लवित लताएँ चकित अनजान-सी रश्मियाँ अनिल संग जोहती जब बाट ऊँघते स्वप्न की समेटे दामन में सौग़ात पुकारती आवाज़ का कोलाहल क्यों मौन है?धैर्य बादलों का टूटा नभ से छूटा भ...
अनीता सैनी
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गुज़रे छह महीनों ने पी है अथाह पीड़ा  पिछले सौ साल की त्रासदी की।पीली पड़ चुकी है छरहरी काया इनकी हर दिन की सिसकियाँ सजी हैं ज़ुबाँ पर।तुम्हें देख एक बार फिर हर्षाएँगे ये दिन  छिपाएँगे आँखों के कोर में खारा पानी।कभी काजल तो कभी सुरमा लगाएँगे&nb...
अनीता सैनी
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अखबार के खरदरे पन्नों की हैडिंग बदली न मौलिक तस्वीर कई वर्षों से ढ़ोते आए हैं ये  बाढ़ के  पानी का बोझिल भार न पानी ने बदला रास्ता अपना  न बहने वाले गाँव घरों ने प्रत्येक वर्ष बदलती है पानी की धारा कभी पूर्व तो कभी पश...
 पोस्ट लेवल : सामाजिक सरोकार बाढ़