ब्लॉगसेतु

अनीता सैनी
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                                              दौड़तीं हैं वे परछाइयाँ,  भूख से व्याकुल,   गाँव से शहर की ओर, और उसी भूख को, &n...
अनीता सैनी
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महावन में दौड़ते देखे, अनगिनत जाति-धर्म और,मैं-मेरे के अस्तित्त्वविहीन तरु, सरोवर के किनारे सहमी, खड़ी मैं सुनती रही, निर्बोध बालिका की तरह, उनकी चीख़ें। ठिठककर बैठ गयी,अर्जुन वृक्ष के नीचे मैं,देख-सुन  रही थी,शही...
अनीता सैनी
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अकेली औरतें अकेली कहाँ होती हैं,  घिरी होती हैं वे ज़िम्मेदारियों से, गिरती-उठती स्वयं ही सँजोती हैं आत्मबल,   भूल जाती हैं तीज-त्योहार पर संवरना। सूखे चेहरे पर पथरायी आँखों से, दे रही होती हैं वे अनगिनत प्रश्नों के उत्तर, वर्...
अनीता सैनी
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उमड़ा जग में तांडव तम का, मानवता शर्मसार है, इंसा-इंसा को निगल रहा, सजा कैसा बाज़ार है? अतृप्त इच्छा को मचलता मन, अहं का बढ़ता भार है,  होड़ कैसी बढ़ी उन्नति की,  अवनति का शृंगार है, सुख वैभव स्वार्थ सिद्धि को, &nbs...
अनीता सैनी
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चीर तिमिर की छाती को अब,  सूरज उगने वाला है, हार मान क्यों बैठा राही, तम के बाद उजाला है।दूर नहीं है मंज़िल राही,कुछ डग का खेल निराला है,ढल जायेगी बोझिल रात्रि,कर्म नश्वर नूतन उजाला है।बंजर में कुसुम कुमोद खिला, धरा ने संबल संभाला है, &...
अनीता सैनी
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वे स्वतः ही पनप जाते हैं,गंदे गलियारे मिट्टी के ढलान पर,अधुनातन मानव-मन की बलवती,हुई आकांक्षा की तरह ।रेगिस्तान-वन खेत-खलिहान घर-द्वार, मानवीय अस्तित्त्व से जुड़ी बुनियादी तहें, इंसानी साँसों को दूभर बनाते अगणित बीज, गाजर घास बन गयी है अब मानवता...
अनीता सैनी
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सोलह बसंत बीते, बाँधे चंचलता का साथ,   आज सुनी ख़ुशियों की, प्रफुल्लित पदचाप,  घर-आँगन में बिखरी यादें,  महकाती बसंत बयार,  छौना मेरा यौवन की, दहलीज़ छूने को तैयार ।गगन में फैली चाँदनी-सा, शुभ्रतामय यश...
अनीता सैनी
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वे सजकता की सीढ़ी से,  क़ामयाबी के पायदान को पारकर,  अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से, सुख का आयाम शोषण को बताने लगे |सुन्न हो रहे दिल-ओ-दिमाग़,   दर्द में देख मानव को मानव अटटहास करता, सूख रहा हरसिंगार-सा हृदय, पारस की चाह में...
अनीता सैनी
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अदब से आदमी,आदमी होने का ओहदा, आदमीयत की अदायगी आदमी से  करता,  आदमी इंसानियत का लबादा पहन,  स्वार्थ के अंगोछे में लिपटा इंसान बनना चाहता  |सूर्य के तेज़-सी आभा मुख मंडल पर सजा,  ज्ञान की धारा का प्रारब्धकर्ता कहलाता,&nbs...
अनीता सैनी
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ज़िम्मेदारी के अभाव का घूँट, अस्पताल का मुख्यद्वार पी रहा,  व्यवस्था के नाम पर, दम तोड़तीं टूटीं खिड़कियाँ,  दास्तां अपनी सुना रहीं, विवशता दर्शाती चौखट,  दरवाज़े को हाँक रही, ख़राब उपकरणों की सजावट, ...