ब्लॉगसेतु

Krishna Kumar Yadav
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चर्चित ब्लॉगर व साहित्यकार एवं लखनऊ मुख्यालय परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ कृष्ण कुमार यादव  गुजरात में आयोजित होने वाले अहमदाबाद इंटरनेशनल लिटरेचर में बतौर स्पीकर शामिल होंगे। डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव "भाषा के बदले स्वरुप" सत्र को सम्बोधित करेंगे और लोगो...
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नेक-नीयत हमेशा सलामत रहेडॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'मीत बेशक बनाओ बहुत से मगर,मित्रता में शराफत की आदत रहे।स्वार्थ आये नहीं रास्ते में कहीं,नेक-नीयत हमेशा सलामत रहे।।--भारती का चमन आप सिंचित करो,भाव मौलिक भरो, शब्द चुनकर धरो,काल को जीत लो अपने ऐमाल से,गीत में सुर क...
रविशंकर श्रीवास्तव
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रविशंकर श्रीवास्तव
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सचिन श्रीवास्तव
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मेरे प्रिय कवियों में लगभग सभी हिंदुस्तानी और उसमें भी हिंदी के कवि ज्यादा हैं। अंग्रेजी साहित्य का मैं बहुत अच्छा विद्यार्थी नहीं हूं, इसके बावजूद मैं ईलियट के पास बार बार जाता हूं। अंग्रेजी पढ़ने की अपनी सीमाओं से जूझते हुए। इसकी वजह क्या होगी, पता नहीं। कई बार त...
 पोस्ट लेवल : साहित्य
Krishna Kumar Yadav
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गुजरात में आयोजित हुए "अहमदाबाद इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल" (Ahmedabad International Literature Festival) में चर्चित ब्लॉगर व साहित्यकार एवं लखनऊ मुख्यालय परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ कृष्ण कुमार यादव  बतौर स्पीकर शामिल हुए। इस दौरान डाक निदेशक कृष्ण कुमार...
राजीव सिन्हा
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    जागता है खुदा और सोता है आलम।     कि रिश्‍ते में किस्‍सा है निंदिया का बालम।।     ये किस्सा है सादा नहीं है कमाल।।     न लफ्जों में जादू बयाँ में जमाल।।     सुनी कह रहा हूँ न देखा है हाल।।     फिर भी न शक के उठाएँ सवाल।।     कि किस्‍से पे लाजिम है सच का असर।।  ...
राजीव सिन्हा
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शाम को गोधूलि की बेला, कुली के सिर पर सामान रखवाये जब बाबू राधाकृष्ण अपने घर आये, तब उनके भारी-भारी पैरों की चाल, और चेहरे के भाव से ही कुंती ने जान लिया कि काम वहाँ भी नहीं बना। कुली के सिर पर से बिस्तर उतरवाकर बाबू राधाकृष्ण ने उसे कुछ पैसे दिए। कुली सलाम करके चल...
राजीव सिन्हा
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इस ‘आज’, ‘कल’, ‘अब’, ‘जब’, ‘तब’ से सम्पूर्ण असहयोग कर यदि कोई सोचे क्या, खीज उठे कि इतना सब कुछ निगलकर – सहन कर इस हास्यास्पद बालि ने काल को क्यों बाँधा। इस ‘भूत’, ‘भविष्य’, ‘वर्तमान’ का कार्ड – हाउस क्यों खड़ा किया, हाँ, यदि सोचे क्या, खीज उठे कि कछुए...
राजीव सिन्हा
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अनुमानित समय : 17 मिनटबहार फिर आ गई। वसन्त की हल्की हवाएँ पतझर के फीके ओठों को चुपके से चूम गईं। जाड़े ने सिकुड़े-सिकुड़े पंख फड़फड़ाए और सर्दी दूर हो गई। आँगन में पीपल के पेड़ पर नए पात खिल-खिल आए। परिवार के हँसी-खुशी में तैरते दिन-रात मुस्कुरा उठे। भरा-भराया घर।...