ब्लॉगसेतु

kumarendra singh sengar
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पिछले साल इन्हीं दिनों एक बहुत बड़े से कार्यक्रम का हिस्सा बने हए थे. उसी समय एक बहुत ही बुरी खबर सुनने को मिली थी. कार्यक्रम में चेहरे पर मुस्कराहट लाकर लोगों से मिलने की विवशता और दिल में उस बुरी खबर के चलते उठती दुःख की लहर. दोनों के बीच संतुलन बैठाना और दोनों स्...
 पोस्ट लेवल : सुख-दुःख जीवन ज़िन्दगी
kumarendra singh sengar
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कहते हैं कि दुःख-दर्द को बहुत दिनों तक याद नहीं रखना चाहिए. जीवन में घटित होने वाली कष्टकारी घटनाओं को भी भुला कर आगे बढ़ना चाहिए. जीवन का फलसफा यही होना चाहिए, इसी में ज़िन्दगी का सार भी है. सभी के जीवन में अच्छे-बुरे पलों का आना होता है, सुखद-दुखद घटनाओं का आना होत...
 पोस्ट लेवल : दुर्घटना सुख-दुःख
kumarendra singh sengar
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समस्याएं सबसे साथ होती हैं पर हमें सिर्फ अपनी समस्या ही सबसे बड़ी क्यों लगती है? कष्ट किसी न किसी रूप में सबके साथ जुड़ा है पर हमें सिर्फ अपना ही कष्ट क्यों सबसे बड़ा दिखाई देता है? क्यों हमें किसी और के कष्ट, समस्या बड़ा समझ नहीं आता? क्यों अपने ही कष्ट को, अपनी समस्य...
kumarendra singh sengar
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ज़िन्दगी जितनी सहज-सरल है उतनी ही कठिन-क्लिष्ट है. एक पल में लगता है जैसे सारी सहजता, सभी कुछ आसानी से उपलब्ध हो गया है. उसी एक पल में लगने लगता है जैसे जीवन को गति प्रदान करना कठिन होता जा रहा है. सहजता और कठिनता जिंदगी के ऐसे दो पहलू हैं जो हर पल एक साथ रहते हैं म...
kumarendra singh sengar
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तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो, किसी ग़ज़ल की इस एक पंक्ति ने हँसने-मुस्कुराने तक पर सवालिया निशान लगा दिए हैं. क्या वाकई ऐसा है कि ज्यादा हँसने-मुस्कुराने वाला व्यक्ति अपने भीतर किसी दर्द को छिपाने की कोशिश कर रहा है? क्या वाकई यह सत्य है...
kumarendra singh sengar
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दुःख को लेकर एक पोस्ट लिखी थी, दो-चार दिन पहले. उस पोस्ट को लेकर भी लोगों में सवाल-जवाब की स्थिति बनी है. संशय की स्थिति बनी है. पता नहीं क्यों समाज में लोग अपने दुःख को ही सबके दुखों से अधिक बड़ा साबित करने पर लगे रहते हैं? समझ नहीं आता है कि सार्वजनिक रूप से क्यों...
kumarendra singh sengar
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दुःख, ये शब्द ऐसा है जिसके बारे में पौराणिक ग्रंथों ने खूब व्याख्या की है तो धार्मिक ग्रंथों, व्यक्तियों ने भी इसके बारे में अपनी-अपनी तरह की परिभाषाएं, व्याख्याएँ दी हैं. धार्मिक आधार पर दुःख को मानव जीवन के लिए कर्मों का आधार माना गया है. एक तरह का आवश्यक अंग मान...
kumarendra singh sengar
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जिस तरह एक सिक्के के दो पहलू होते हैं, उसी तरह जीवन भी दो पहलुओं में सिमटा हुआ है. दुःख और सुख का, हँसी और आँसू का, ख़ुशी और गम का सह-सम्बन्ध जीवन में सहज ही देखने को मिलता है. जीवन जितना सहज, खुशनुमा, सुरमयी दिखाई देता है उतना ही क्रूर, जटिल, दुखद भी है. दुःख-सुख क...
Rajendra kumar Singh
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                                               जीवन मृत्यु तो एक परम सत्य,                ...
 पोस्ट लेवल : सुख-दुःख KAVITA भजन कविता