ब्लॉगसेतु

रवीन्द्र  सिंह  यादव
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तिमिर भय नेबढ़ाया हैउजास से लगाव,ज्ञानज्योति नेचेतना से जोड़ातमस कास्वरूपबोध और चाव।घुप्प अँधकार मेंअमुक-अमुक वस्तुएँपहचानने का हुनर,पहाड़-पर्वतकुआँ-खाईनदी-नालेअँधेरे में होते किधर?कैसी साध्य-असाध्यधारणा है अँधेरा,अहम अनिवार्यता भी हैसृष्टि में अँधेरा।कृष्णपक्ष कीविकट...
sanjiv verma salil
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सृष्टि का मूल*अगम अनाहद नाद ही, सकल सृष्टि का मूलव्यक्त करें लिख ॐ हम, सत्य कभी मत भूलनिराकार ओंकार का, चित्र न कोई एकचित्र गुप्त कहते जिसे, उसका चित्र हरेकसृष्टि रचे परब्रम्ह वह, पाले विष्णु हरीशनष्ट करे शिव बन 'सलिल', कहते सदा मनीषकंकर-कंकर में रमा, शंका का कर अन...
पम्मी सिंह
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सृष्टि चिर निरुपमअंतर्मन सा अनमोल भ्रमण आत्मा का न संस्करण किंजल्क  स्वर्ण सरजीतसमस्त भावदिव्यपुंज दिव्यपानप्रज्ञा का भावगुंजायमान,जागृत सुप्तवस्थानिर्गुण निर्मूलअविवेका,निः सृत वाणीअस्तु आरम्भसदा निर्विकारीकर्म अराधनाविकर्म विवेकशून्यनिष्काम कर्मयोग...
Sanjay  Grover
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"भगवान नही है चलो मान भी लिया जाये और ये भी मान लिया जाये की सृष्टि की रचना अपने आप हो गयी तो हर चीज का जोड़ा कैसे बना? पशु-पक्षी बने और उनके भी जोड़े बने फिर नस्ल आगे बढ़ने के लिये भी इंतेज़ाम हो गया? पेड़ पौधे चन्द सूरज और तारे सब के सब अपने आप बन गये और अपनाकाम...
sanjiv verma salil
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शिव, शक्ति और सृष्टि  सृष्टि रचना के सम्बन्ध में भारतीय दर्शन में वर्णित एक दृष्टान्त के अनुसार शिव निद्रालीन थे. शिव के साथ क्रीड़ा (नृत्य) करने की इच्छा लिये शक्ति ने उन्हें जाग्रत किया. आरंभ में शिव नहीं जागे किन्...
 पोस्ट लेवल : शक्ति shiv srushti सृष्टि शिव shakti
मनोज कुमार  भारती
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सृष्टि (पृथ्वी)की आयु (अवधि) चार अरब बत्तीस करोड़ वर्ष है। अब तक यह एक अरब छयानवे करोड़ आठ लाख त्रेपन हजार एक सौ चौदह वर्ष की हो चुकी है और दो अरब पैंतीस करोड़ इक्यावन लाख छयालिस हजार आठ सौ छियासी वर्ष प्रलय होने में शेष  हैं।विक्रम संवत्सर 2072 की हार्दिक बधाई ए...
ऋता शेखर 'मधु'
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तुम सृष्टि...नम्रता से झुकती हुईप्यार का सहारा लिएमौली सी पावनधरा से धैर्य लेकरसतत बढ़ने का संदेशअक्षर में मौलिमणिऊँ का तत्व लिएवक्त की बंजारनसौन्दर्य का दुलार लेकरगुलमोहर जैसी जिजीविषा मेंधरती पर'मै' और 'आप' से परेदुआओं के मनुहार मेंतन्हा सागर कीआह और गम के साथअपा...
mahendra verma
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जंगल तरसे पेड़ को, नदिया तरसे नीर,सूरज सहमा देख कर, धरती की यह पीर ।मृत-सी है संवेदना, निर्ममता है शेष,मानव ही करता रहा, मानवता से द्वेष ।अर्थपिपासा ने किया, नष्ट धर्म का अर्थ,श्रद्धा की आंखें नहीं, सत्य हुआ असमर्थ ।‘मैं’ से ‘मैं’ का द्वंद्व भी ,सदा रहा अज्ञेय,पर स...
राजीव कुमार झा
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मनुष्य जाति की उत्पति के दो आदिम स्रोत हैं – आदम और हौवा.यही किसी देश में शिव और शक्ति के रूप में,किसी देश में पृथ्वी और आसमान के नाम से,ज्यूस तथा हेरा तथा कहीं यांग और यिन जैसे विभिन्न प्रतीकों से जाने जाते हैं.भिन्न-भिन्न नामों एवं प्रतीकों के बावजूद मानव जाति की...
केवल राम
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चिन्तन मनुष्य की सहज प्रवृति है. यह गुण उसे प्रकृति द्वारा प्रदत्त है. चिन्तन के इसी गुण के बल पर उसने प्रकृति के रहस्यों को समझने की भरपूर कोशिश की है, और आज तक वह इस दिशा में अनवरत क्रियाशील है. उसके चिन्तन के अनेक आयाम हैं और हर एक आयाम का अपना एक महत्व है. दुन...