ब्लॉगसेतु

Rajeev Upadhyay
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चार बार मैं गणतंत्र-दिवस का जलसा दिल्ली में देख चुका हूँ। पाँचवीं बार देखने का साहस नहीं। आखिर यह क्या बात है कि हर बार जब मैं गणतंत्र-समारोह देखता, तब मौसम बड़ा क्रूर रहता। छब्बीस जनवरी के पहले ऊपर बर्फ पड़ जाती है। शीत-लहर आती है, बादल छा जाते हैं, बूँदाबाँदी होत...
Bharat Tiwari
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हरिशंकर परसाई की 'जिंदगी और मौत का दस्तावेज़' को पढ़ते हुए मुझे ऐसा क्या लगा होगा जो इसे टाइप किया और यहाँ आपसब के लिए लगाया...यह मैं अभी सोच रहा हूँ. शायद रचना के शुरू में उनका यह कहना –संपादकों ने कभी कहा था–इमरजेंसी है तो डरो। मैं डरा। फिर कहा–इमरजेंसी की तारीफ म...
sanjiv verma salil
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व्यंग्य लेखांश :‘भगत की गत’ हरिशंकर परसाई जी *...एक भगत ने मरने के बाद भगवान के पास जाकर स्वर्ग की डिमांड की, फिर क्या हुआ ......प्रभु ने कहा- तुमने ऐसा क्या किया है, जो तुम्हें स्वर्ग मिले?भगतजी को इस प्रश्न से चोट लगी। जिसके लिए इतना किया, वही पूछता है...
Rajeev Upadhyay
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एक अंतरंग गोष्ठी सी हो रही थी युवा असंतोष पर। इलाहाबाद के लक्ष्मीकांत वर्मा ने बताया – पिछली दीपावली पर एक साड़ी की दुकान पर काँच के केस में सुंदर माडल खड़ी थी। एक युवक ने एकाएक पत्थर उठाकर उस पर दे मारा। काँच टूट गया।आसपास के लोगों ने पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया?...
sanjiv verma salil
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लघुकथा सुधारहरिशंकर परसाई * एक जनहित की संस्‍था में कुछ सदस्यों ने आवाज उठाई, 'संस्था का काम असंतोषजनक चल रहा है। इसमें बहुत सुधार होना चाहिए। संस्था बरबाद हो रही है। इसे डूबने से बचाना चाहिए। इसको या तो सुधारना चाहिए या भंग कर देना चाहिए। संस्था के अध्‍यक्ष ने पू...
Yashoda Agrawal
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एक बाड़ा था। बाड़े में तेरह किराएदार रहते थे। मकान मालिक चौधरी साहब पास ही एक बँगले में रहते थे।एक नए किराएदार आए। वे डिप्टी कलेक्टर थे। उनके आते ही उनका इतिहास भी मुहल्ले में आ गया था। वे इसके पहले ग्वालियर में थे। वहाँ दफ्तर की लेडी टाइपिस्ट कोलेकर...
 पोस्ट लेवल : हरिशंकर परसाई
Sanjay  Grover
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जेएनयूवादियों को दुआ/प्रार्थना करते देखा तो दो पुराने फ़ेसबुक स्टेटस याद आ गए-1.पंडित जवाहरलाल नेहरु जे एन यू के छात्र थे। यही वजह है कि उन्होंने एक प्रगतिशील विचारधारा की नींव रखी। वरना और किसी तरह यह संभव नहीं था।02-08-2013(on पागलखाना facebook)2.जेएनयू से मेरे भी...
Yashoda Agrawal
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शहर में ऐसा शोर था कि अश्‍लील साहित्‍य का बहुत प्रचार हो रहा है। अखबारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्‍लील पुस्‍तकें बिक रही हैं।दस-बारह उत्‍साही समाज-सुधारक युवकों ने टोली बनाई और तय किया कि जहाँ भी मिलेगा हम ऐसे साहित्‍य को छी...
 पोस्ट लेवल : हरिशंकर परसाई
Yashoda Agrawal
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बिना जाने बेवकूफ बनाना एक अलग और आसान चीज है। कोई भी इसे निभा देता है।मगर यह जानते हुए कि मैं बेवकूफ बनाया जा रहा हूं और जो मुझे कहा जा रहा है, वह सब झूठ है- बेवकूफ बनते जाने का एक अपना मजा है। यह तपस्या है। मैं इस तपस्या का मजा लेने का आदी हो गया हूं। पर यह महंगा...
 पोस्ट लेवल : हरिशंकर परसाई
rahul dev
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मृत्यु के बाद हमारे देश में कुछ धार्मिक कर्मकांड होते हैं और अगर मौत एक साहित्यकार की है तो कुछ साहित्यिक कर्मकांड भी होते हैं। इसके बाद सारे दायित्व पूरे हो जाते हैं। भारतीय समाज में एक खास प्रवृत्ति यह भी है कि जब तक देह सामने होती है तब तक वाचाल संस्कृति और उसके...