ब्लॉगसेतु

Dr. Mohd. Arshad Khan
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मियाँ मुनक्का रोज़ की तरह हकीम किशमिश के दवाख़ाने पहुँचे तो वह बेचैनी से टहलक़दमी कर रहे थे। मियाँ मुनक्का को देखते ही लपककर आए और दोनों कंधे थामते हुए बोले, ‘‘आ गए दोस्त! मैं बड़ी देर से तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था।’’मियाँ मुनक्का हैरान रह गए। और दिनों में जब वह चाय...
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एक बार मशहूर लेखक मूरखमल ‘अज्ञानी’ ने एक किताब लिखने की सोची, जिसमें दुनिया भर के मूर्खों के क़िस्से हों। वह बहुत दिनों से चाह रहे थे कि अपनी बिरादरीवालों के लिए कुछ ऐसा कर जाएँ, जिससे ज़माना याद करे। उन्होंने किताब का नाम भी सोच रखा था-‘मूर्खों की महागाथा’। दुनिया भ...
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सहन में पैर रखते ही मियाँ मुनक्का को जैसे चक्कर आ गया। अभी-अभी तिपाई पर चार मोटी-ताज़ी मूलियाँ रखी थीं। पर अब सिवा डंठलों के वहाँ कुछ भी नहीं दिख रहा था। उस पर तुर्रा यह कि पास में पहलवान पिस्ता का बकरा बेफिक्री से जुगाली किए जा रहा था।मियाँ मुनक्का का दिल बैठ गया।...
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बिन्नू के दादा जी को भूलने की बड़ी बीमारी है। दादी उनसे सेब लाने को कहती हैं और वे संतरे ले आते हैं। दादी टोकती हैं तो हँसकर कहते हैं-‘‘इस बार संतरों से काम चला लो, सेब अगली बार ला दूँगा।’---और जब अगली बार जाते हैं तो अमरूद उठा लाते हैं।उनकी इस आदत से परेशान होकर द...
 पोस्ट लेवल : हास्य बाल कहानी
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जब हर कहीं रामलीला समाप्त हो जाती है, तब बच्चों की असली रामलीला शुरू होती है। पतली कमची को मोड़कर दोनों सिरे धागे से बाँध लिए, धनुष तैयार हो गया। पतली-पतली सिरकियाँ ले लीं, बाण बन गए। बस, सेना लेकर निकल पड़े लंका-विजय के लिए।यही हाल काशीपुर का था। इधर गाँव की रामलीला...
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गई भैंस पानी मेंएक दिन डेयरी पर पहुँचकर जब हकीम चिलगोजा को पता चला कि आज से दूध पैंतीस रुपए लीटर मिलेगा, तो बिफर पड़े। बड़बड़ाते हुए अपनी पाँच लीटर की डोलची, जिसमें वह सिर्फ पाव भर दूध लेते थे, उठाई और लौट पड़े। मारे ग़ुस्से के तय कर लिया कि आज से दूध का इस्तेमाल बंद। ब...
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मियाँ चिलगोज़ा की मूँछेंहमारी क़स्बे में एक मियाँ चिलगोज़ा रहते हैं। रूप ऐसा कि जो देखे, देखता ही रह जाए। फुंदनोंवाली चौगोशिया टोपी, कमरतोइयों वाली शानदार अचकन और पैरों में मुड़े हुए घेतले जूते। जैसे कोई चलता-फिरता अजायबघर। मियाँ चिलगोज़ा से मशहूर उनकी मूँछें हैं। इतनी...
 पोस्ट लेवल : हास्य बाल कहानी
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बब्बन पढ़ने-लिखने के मामले में जितना होशियार था, जीवन-व्यवहार के मामले में उतना ही बुद्धू। गणित की कठिन से कठिन प्रश्नावलियाँ हल करना उसके लिए चुटकियों का काम था, पर बाजार से दो रुपए का नमक लाने में उसे पसीने आ जाते थे। दूकानदार भी उसे बुद्धू जानकर ठग लेते थे।उससे द...
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फत्तन मियाँ दिखने में तो सींक-सलाई थे, लेकिन चीख़ने-शोर मचाने में अच्छे-अच्छों के छक्के छुड़ा देते थे। उन्होंने बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ अपनी इसी ताक़त के बल पर फतह कर रखी थीं। दोस्तों ने भी ख़ूब चढ़ा रखा था। इसी गुमान में वे सीना ताने-ताने फिरते थे। एक दिन इसी ग़लतफ़हमी में वे मु...
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