ब्लॉगसेतु

रवीन्द्र  सिंह  यादव
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हाँ मैं चंबल नदी हूँ !ऊबड़-खाबड़ बीहड़ों मेंबहती हुई नाज़ से पली हूँ.रोना नहीं रोया हैअब तक मैंनेअपने प्रदूषित होने का, जैसा कि संताप झेल रही हैंहिमालयी नदियाँ दोगंगा-यमुना होने का.उद्गम महू-इंदौर सेयमुना में संगम भरेह-इटावा तकबहती हूँ कल-कल स्वयंवीरा,मुझमें समाया दर्द...
यूसुफ  किरमानी
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मुस्तजाब की कविताएं हिंदीवाणी पर आप लोग पहले भी पढ़ चुके हैं...पेश है उनकी नवीनतम कवितासब धुंधला नजर आ रहा है ..........................................सब धुंधला नजर आ रहा हैसच, झूठ, तारीख, तथ्यकिसे मानें, रह गया है क्या सत्यसलाखें बन गए हैं मस्तिष्क हमारेअंदर ही घ...
Roli Dixit
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उस रोज़ पूछा था किसी ने हमसेतुम्हारा नाम क्या हैहमने ये कहकर उन्हेंमुस्कराने की वजह दे दीकि एक दूसरे का नाम न लेना ही तोहमारा प्रेम है...कितने बावले हैं लोगकि वो तुम्हें कहीं भी ढूंढ़ते हैंमेंडलीफ की आवर्त सारणी में,न्यूटन के नियम में,पाइथागोरस की प्रमेय में,डार्वि...
Roli Dixit
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रवीन्द्र  सिंह  यादव
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ख़ुशी आयीख़ुशी चली गयी ख़ुशी आख़िर ठहरती क्यों नहीं ?आँख की चमक मनमोहक हुई कुछ देर के लिये फिर वही रूखा रुआँसापनग़म आता है जगह बनाता है ठहर जाता है बेशर्मी सेज़िन्दगी को बोझिल बनाने भारी क़दमों से दुरूह सफ़र ...
डॉ. राहुल मिश्र Dr. Rahul Misra
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बळिहारी उण देस री, माथा मोल बिकाय ।धव धावाँ  छकिया  धणाँ, हेली आवै दीठ ।मारगियो  कँकू  वरण,  लीलौ  रंग  मजीठ ।।नहँ  पड़ोस  कायर  नराँ,  हेली वास सुहाय ।बलिहारी उण देस री,  माथा मोल बिकाय ।।घोड़ै चढ़णौ&nbsp...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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दिल-नशीं हर्फ़सुननेकोबेताबहो दिलकान कोसुनाईदेंज़हर बुझे बदतरीन बोलक़हर ढाते हर्फ़नफ़रत के कुँए सेनिकलकरआते हर्फ़तबाहीका सबबबनते हर्फ़भरा हो जिनमेंख़ौफ़ और दर्पतोकुछ तो ज़रूर करोगे.....कान बंद करोगे ?बे-सदा आसमान सेकहोगे-निगल जाओ इन्हेंयाभाग जाओगेसुननेसुरीला रागवहाँ...
Tejas Poonia
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कविता संग्रह - हम रच रहे हैंप्रकाशक – यश पब्लिकेशंसISBN नंबर – 978-93-81491-30-0प्रथम संस्करण – फरवरी 2017 मूल्य – 450 हिंदी साहित्य के वर्तमान दौर में हर कोई कवि है, लेखक है, कहानीकार और आलोचक है । किंतु उनमें कुछ ऐसे भी हैं जो निष्पक्ष तरीके से कविताएँ लिख रहे है...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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निकाल तेरे तरकश में जितने तीर हैं हमारी क़लम तेरे लिये चमचमाती शमशीर है जिगर फ़ौलादी हो गया है हालात से लड़ते-लड़ते नहीं जीना हमें गवारा अब मौत से डरते-डरते हम नीम को नीम और आम को आम ही कहेंगे इ...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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भेड़िया मेमने से कह रहा है आप मेरी शरण में महफ़ूज़ हैं, सलामत हैं मेमना समझ नहीं पाता वक़्त की हेरा-फेरी है या आयी क़यामत है अब शिकारी पैंतरे बदल रहा है हमदर्द बनकर ख़ंजर घौंप रहा है मेमने का योजनाबद्ध&nbsp...