ब्लॉगसेतु

सतीश सक्सेना
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इन दिनों भयंकर गर्मी पड़ रही है , काफी समय से दौड़ना बंद कर, आराम करने की मुद्रा में चल रहा हूँ ! हानिकारक मौसम में शरीर पर नाजायज जोर न पड़े इस कारण यह रेस्ट आवश्यक भी है मगर सम्पूर्ण आराम के दिनों खाने के चयन पर अतिरिक्त सावधानी बरतनी होती है ! अन्यथा ट्रकों के पीछे...
डॉ. राहुल मिश्र Dr. Rahul Misra
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 भारत में भी है ‘सिल्क रूट टूरिज़्म’ का मजामध्यकालीन व्यापारिक गतिविधियों की रोचक और साहसिक कथाएँ सिल्क रूट या रेशम मार्ग में बिखरी पड़ी हैं। सिल्क रूट का सबसे चर्चित हिस्सा, यानि उत्तरी रेशम मार्ग 6500 किलोमीटर लंबा है। दुनिया-भर में बदलती स्थितियों के कारण स...
सतीश सक्सेना
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शायद यह अकेला समाज है जहाँ ऊपरी दिखावे को सम्मान देना सिखाया जाता है ! अगर सामने से कोई गेरुआ वस्त्र धारी और पैर में खड़ाऊं पहने आ रहा है तो पक्का उस महात्मा के चरणों में झुकना होगा और आशीर्वाद मांगना ही है चाहे वह बुड्ढा पूरे जीवन डाके डालकर दाढ़ी बढ़ाकर छिपने के लिए...
Pratibha Kushwaha
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तो तुम लेखक बनना चाहते हो- चार्ल्स बुकोवस्कीअगर फूट के ना निकलेबिना किसी वजह केमत लिखो.अगर बिना पूछे-बताये ना बरस पड़ेतुम्हारे दिल और दिमाग़और जुबां और पेट सेमत लिखो.अगर घंटों बैठना पड़ेअपने कम्प्यूटर को ताकतेया टाइपराइटर पर बोझ बने हुएखोजते कमीने शब्दों कोमत लिखो.अगर...
आचार्य  प्रताप
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सबसे पहले *हिन्दी* को समझते है ।यह जिस भाषा धारा के विशिष्ट दैशिक रुप का नाम है वह है संस्कृत ।संस्कृत का समय 1500ई.पूर्व से 500ईस्वी पूर्व तक माना जाता है।तत्कालीन समय में बोलचाल की भाषा संस्कृत ही थी। उसी का शिष्ट और मानक रूप सँस्कृत साहित्य में प्रयुक्त हुआ।यह ध...
डॉ. राहुल मिश्र Dr. Rahul Misra
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 शयोक! तुम्हें पढ़ा जाना अभी शेष है...कहते हैं, पहाड़ी नदियाँ बड़ी शोख़ होती हैं, चंचल होती हैं। लहराना, बल खा-खाकर चलना ऐसा,  कि ‘आधी दुनिया’ को भी इन्हीं से यह हुनर सीखना पड़े। पहाड़ी नदियाँ तो बेशक ऐसी ही होती हैं, मगर कभी हिमानियों से अपना रूप और आकार...
सतीश सक्सेना
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हिंदी के बदनाम जगत में , यारों  मैं भी लिखता हूँ !अपने घर में ध्यान दिलाने, कड़वी बातें लिखता हूँ !तुम्हें बुलाने आधे मन से, धुंधली आँखों लिखता हूँ !टूटा चश्मा, रोती राखी , माँ की धोती लिखता हूँ !मां को चूल्हा नजर न आये, पापा लगभग टूट चुकेते...
सतीश सक्सेना
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लोगों में इन कविताओं की,आदत नहीं रही सुन भी लें तो भी,मन से, इबादत नहीं रही !इक वक्त था जब कवि थे देश में गिने चुने भांडों  और  चारणों से , मुहब्बत नहीं रही !जब से बना है काव्य चाटुकार , राज्य का जनता को भी सत्कार की आदत नहीं रही माँ से मिल...
सतीश सक्सेना
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हम तो केवल हंसना चाहें  सबको ही, अपनाना चाहें मुट्ठी भर जीवन पाए हैं हंसकर इसे बिताना चाहें खंड खंड संसार बंटा है , सबके अपने अपने गीत । देश नियम,निषेध बंधन में, क्यों बांधा जाए संगीत ।नदियाँ,झीलें,जंगल,पर्वतहमने लड़कर बाँट लिए। पैर जहाँ पड़ गए हमारे...
सतीश सक्सेना
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हिंदी साहित्य में ऐसे बहुत कम लोग हैं जो बिना किसी दिखावा शानशौकत के चुपचाप अपना कार्य करते हैं , उनमें ही एक बेहद सादगी भरा व्यक्तित्व अरविन्द कुमार का है जिनको मैंने जितना जानने का प्रयत्न किया उतना ही प्रभावित हुआ !वे मेरठ पोस्ट  ग्रेजुएट &nb...