ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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अब जबकि झाड़ू उठाए नेता, मंत्री, संतरी अख़बारों में छपने के लिए इतने लालायित नहीं दिख रहे, ख़ुद कूड़ा फैलाकर मजमा जुटाने की जद्दोजहद अब ठंडी पड़ गयी है, जनता यू-ट्यूब पर प्रधान सेवक के सफ़ाई वीडियो का इंतज़ार करते-करते थक चुकी है, मन की बात  सुनने के लिए रेडियो खरीद...
Shachinder Arya
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नवंबर आ गया है और कल से ठंड भी कुछ बढ़ गयी है। कश्मीर में बर्फ़ गिरी है। बर्फ़ इंडिया गेट पर उतनी ही अजीब होगी जैसे कि कल एककाँग्रेसी नेता के अपनी लड़कियों को बोझ बताने वाले हलफ़नामे पर रोष प्रकट करते राम माधव थे। इधर कई दिनों से गायब था। बीच में कईबार लौटने की कोशिश भी...
Shachinder Arya
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यह ‘जम्मू’ से ज़्यादा ‘कश्मीर’ में आई बाढ़ है। ऐसा मैं नहीं कह रहा, ऐसा टीवी चैनल दिखा रहे हैं। कई प्रबुद्धजन बीते सालों में आई बाढ़ों के ब्योरों के साथ तय्यार हैं। कोई उन्हे किसी बहस में बुला ले बस। ऐसे भी लोग हैं, जो इस आपदा काल में सेना की रचनात्मक और सकर्मक भूमिका...
Shachinder Arya
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किसी का शहर छोड़कर जाना कैसा है? हमेशा के लिए। कभी लौटकर वापस न आने के लिए। कई दोस्त हैं जो अब यहाँ नहीं हैं। सब बारी-बारी अपने सपनों को समेटकर यहाँ से चल दिये। जिन बक्सों में वह इन्हे भरकर लाये थे, उनमें क्या ले गए होंगे, पता नहीं। उन्होने किसी को भी नहीं बताया। शा...
Shachinder Arya
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पता नहीं क्यों हुआ। होना नहीं चाहिए था। फिर भी। चन्दन पाण्डेय की कहानी ‘शुभकामना का शव’ पढ़कर दादी याद आ गयी। कहानी में कामना की कोई दादी क्यों नहीं है? शायद इसलिए। फ़िर तो बड़ी देर तक नीचे गलियारे में घूमते हुए उनकी बहुत याद आई। अगर उस लड़की की दादी होती तब भी क्या उस...
Shachinder Arya
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कुछ ऐसी जगहें होती हैं जहाँ हम ख़ुद होते हैं। अपने आप में बिलकुल नंगे। बिलकुल अकेले। बेपरदा। बेपरवाह। लिखने के पहले, लिखने के बाद, हम कुछ-कुछ बदल रहे होते हैं। शायद ख़ुद को। अपनी लिखी उन बातों को। जो चाहकर भी किसी से नहीं कह पाये। कहते-कहते रुक से गए। रुक गए उन्हे सब...
Shachinder Arya
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इस जगह जहाँ हम हैं वह कैसी है। इसे ऐसे पूछना चाहिए के यह हमारे लिए कैसी है? जगह या तो हमें ‘स्पेस’ देती है या नहीं देती। यह देना न देना गुणात्मक रूप से कैसा है? किन भूमिकाओं को वह बल दे रहा है। जब यह संचार माध्यम में हो, तब इसका जवाब इतना एकरेखीय नहीं हो सकता। इसके...