उसने रोकना नहीं चाहाउसे रुकना नागवार लग रहा थाबहुत दिनों पहले कांच टूट चुका थागाहे बगाहे चुभ जाता गल्‍ती सेपर सोच रही हूंइसे फेंका क्‍यों नहींपर ये किसी कूड़ेदान तकनहीं ले जाया जा सकताक्‍यों ऐसा क्‍या है ?मन के भारीपन सेज्‍यादा भारी तो नहीं होगाये रिश्तों की किरचें...