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रवीन्द्र  सिंह  यादव
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वर्षों पहले  बसंत की छटा देखने  गाँव आया था,  खेतों में फ़सलों पर  यौवन छाया था।  कहीं गाती थी  चिड़िया मधुर गीत,  कहीं फूल-तितली की  सुरभित पावन प्रीत।  नयनाभिराम रंगों का मेला  सुदूर...
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रवीन्द्र  सिंह  यादव
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वो सुबह जब  ओस से भरी देखी  लगा ज्यों रात ने  विरह की घड़ी देखी  घूँघट कोहरे का ओढ़कर  लाजवँती-से लजाते लाल सूरज की  रक्ताभ रश्मियाँ देखीं   चिकने हरे पत्तों पर  मरकरी-सी सजीं  शबनम की उज्ज्व...
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