ब्लॉगसेतु

रवीन्द्र  सिंह  यादव
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मिटकर मेहंदी को रचते सबने देखा है,उजड़कर मोहब्बत कोरंग लाते देखा है?चमन में बहारों काबस वक़्त थोड़ा है,ख़िज़ाँ ने फिर अपनारुख़ क्यों मोड़ा है?ज़माने के सितम सेन छूटता दामन है,जुदाई से बड़ाभला कोई इम्तिहान है?मज़बूरी के दायरों मेंहसरतें दिन-रात पलीं,मचलती उम्मीदेंकब क़दम...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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निर्माण नशेमन का नित करती वह नन्हीं चिड़िया ज़िद करती तिनके अब बहुत दूर-दूर मिलते मोहब्बत के नक़्श-ए-क़दम नहीं मिलतेख़ामोशियों में डूबी चिड़िया उदास नहीं दरिया-ए-ग़म का किनारा भी पास नहीं दिल में ख़लिश ता-उम्र सब्...
PRABHAT KUMAR
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मेरे क़दमों पर चलने का मौका खो दिया तुमनेतुम्हारे साथ चलने को अब सौ बार सोंचूंगातुम्ही से प्यार किया था, तो तुम्हारे राह चला था मैं तुम्हारी हर इक आदत को अपना ढाल लिया था मैंमेरी हर बात को तुमने ऐसे हलके में लिया थापतंगा जला शमां पर था, मजबूर किया था तुमनेअब इज...
 पोस्ट लेवल : कविता मेरे क़दमों
Kailash Sharma
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एक दिन तो मिलें,कुछ क़दम तो चलें।राह कब एक हैं,मोड़ तक तो चलें।साथ जितना मिले,कुछ न सपने पलें।राह कितनी कठिन,अश्क़ पर क्यूँ ढलें।भूल सब ही गिले,आज़ फ़िर से मिलें।...©कैलाश शर्मा 
Kailash Sharma
175
जग से है क्यूँ मोह बढाताबस आगे तू बढ़ बंजारा।मिले काफ़िले उन्हें भुला दे कौन साथ चलता बंजारा।कौन रुका है यहाँ सदा कोकौन ठांव होता अपना है।सभी मुसाफ़िर हैं सराय मेंएक एक सबको चलना है।पल भर हाथ थाम ले काफ़ीसाथ उम्र का कब बंजारा।अच्छा बुरा कौन है जग मेंजो भी मिलता सा...
Kailash Sharma
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थके क़दम कब तक चल पायें, मंज़िल नज़र नहीं आती है,जीवन का उद्देश्य नहीं बसकेवल मील के पत्थर गिनना।सफ़र हुआ था शुरू ज़हाँ सेकितने साथ मिले राहों में,कभी काफ़िला साथ साथ थाअब बस सूनापन राहों में।कैसे जीवन से हार मान लूँ,   मुझको दूर बहुत है चलना।बना सीढियां स...
Kailash Sharma
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पाने को अपनी मंज़िलचलना होता है स्वयं अपने ही पैरों पर,दे सकते हैं साथ केवल कुछ दूरी तक क़दम दूसरों के.जुटानी होती है सामर्थ करना होता है विश्वास अपने पैरों पर,नहीं रुकता कारवां देने को साथ थके क़दमों का,ढूँढनी होती है स्वयं अपन...