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DHRUV SINGH  "एकलव्य"
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विनय प्रजापति
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शायिर: आफ़ताब अजमेरी यह तजरिबा हुआ है दुनिया में हमको आकर काँटों से दिल लगाओ फूलों से ज़ख़्म खाकर हँसिए तो आप लेकिन यह भी नज़र में लाकर सौ बार रोयिएगा इक बार मुस्कुरा कर इस अहद के उजाले ने यूँ डसा है उसको ख़िलवत नशीं हुआ है सारे दिए बुझाकर जब कुछ नहीं तअल्लुक़ तो दिल के...