ब्लॉगसेतु

Sanjay  Grover
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जब पढ़ते थे तो तरह-तरह के लोगों को पढ़ते थे। साहित्य अच्छा तो लगता ही था मगर यह दिखाना भी अच्छा लगता था कि ‘देखो, हम दूसरों से अलग हैं, हम वह साहित्य भी पढ़ते हैं जो हर किसी की समझ में नहीं आता।’ अब सोचते हैं कि हमारी भी समझ में कितना आता था! गुलशन नंदा, रानू, कर्नल र...
Yash Rawat
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SAD or Social Phobia (Photo: https://thiswayup.org.au/how-do-you-feel/shy/#deal)दोस्‍तों बचपन से ही मुझे लोगों का सामना करने में परेशानी होती है मुझे याद है जब मैं स्‍कूल में पढ़ता था तो बेंच पर सबसे पीछे बैठता था ताकि टीचर मुझ से कुछ पूछ न लें, जैसे टीचर सवाल...
Babita Singh
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Dr. Zakir Ali Rajnish
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विज्ञान दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!  साथियो, आज ही के दिन 28 फरवरी, 2008 को इस ब्लॉग की शुरूआत 'तस्लीम' के रूप में हुई थी, जो अब 'साइंटिफिक वर्ल्ड' के रूप में आपके सामने है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इन 6 सालों में 'साइंटिफिक वर्ल्ड' एक ब्रांड के र...
 पोस्ट लेवल : Human behavior
केवल राम
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यह भी एक सच है कि व्यक्ति जीवन में चाहे जितनी भाषाओँ की जानकारी हासिल कर ले, उन्हें सीख ले, लेकिन जो सोचने और समझने की प्रक्रिया है वह तो उसकी मातृ भाषा के माध्यम से ही संपन्न होती है. इतना ही नहीं मातृ भाषा का प्रभाव उसके जीवन और उसके व्यक्तित्व पर हमेशा झलकता रहत...