ब्लॉगसेतु

Sanjay  Grover
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ग़ज़लभीड़ जब ताली देती है हमारा दिल उछलता हैभीड़ जब ग़ाली देती है हमारा दम निकलता हैहमीं सब बांटते हैं भीड़ को फिर एक करते हैंकभी नफ़रत निकलती है कभी मतलब निकलता हैहमीं से भीड़ बनती है हमीं पड़ जाते हैं तन्हामगर इक भीड़ में रहकर बशर ये कब समझता हैवो इक दिन चांद की चमचम के आ...
Sanjay  Grover
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ग़ज़लय़क़ीं होता नहीं थाकभी सोचा नहीं था19-08-2016सफ़र अच्छा ही ग़ुज़राकहीं जाना नहीं था25-08-2016लगी तन्हाई बेहतरकोई परदा नहीं था26-08-2016बड़ा या छोटा, कुछ भी-मुझे ‘बनना’ नहीं था27-08-2016न अब डर है न चिंता,क्यूं तब सूझा नहीं था07-09-2016-संजय ग्रोवर
Sanjay  Grover
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इस फ़िल्म के बारे में आवश्यक जानकारियां आप इन दो लिंक्स् पर क्लिक करके देख सकते हैं -  1, IMDb  2. Wikipediaआदमी ने दो दुनिया बनाईं-एक दिखाने की, एक छिपाने की।और तरह-तरह की परेशानियों में पड़ गया।अब न वह जी पाता है न किसीको जीने देता है।अब वह खिड़कियों में झ...
विनय प्रजापति
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फ़रहत शहज़ाद | Farhat Shahzad हर साँस में हरचंद महकता हुआ तू है धड़कन का बदन हिज्र के काँटों से लहू हैदिल, गिरती हुई बर्फ़ में, ढलता हुआ सूरज जिस सिम्त भी उठती है नज़र, आलम-ए-हू हैशायद के अभी आस कोई क़त्ल हुई हैरक़्साँ मेरे सीने में किसी ख़ूँ की बू है हर टीस के माथे पे...
Mahesh Barmate
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कुछ वर्ष पहले, जब मैंने लिखना शुरू किया था, बस उनही दिनों की यादों को याद करता मैं, आज अपनी डायरी पढ़ रहा था, तो एक अनमोल नगीना मिला। सोचा कि कुछ छोटे - छोटे फेर बदल के बाद आपके साथ साझा कर लूँ। मिल के भी मिल न सके हम जाने वो क्या मजबूरी थी?फासले तब हो चुके थे...
Mahesh Barmate
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हवा आती ही कहाँ है,जो इस कमरे से बाहर जा पायेगी ?पर फिर भी जाने क्योंखिड़की पे लगा ये पर्दायूँ ही कभी हिल जाता है ...खिड़की से झाँकती रौशनी भीअलविदा कह जाती हैशाम ढलते ही मुझको ...फिर वो कौन है जोअँधेरा चढ़ते ही कमरे में कोई शमा जला जाता है ...जाने कितने मौसम...