ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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हम सब सपनों में रहने वाले लोग हैं। सपने देखते हैं। और चुप सो रहते हैं। उनमें कहीं कोई दीमक घुसने नहीं देते। बक्से के सबसे नीचे वाली तरी में छिपाये रहते हैं। कहीं कोई देख न ले। उसमें किसी की बेवजह आहट कोई खलल न डाल दे। सब वैसा का वैसा बना रहे जैसे सपनों में देखा है।...
Shachinder Arya
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थोड़ी देर झूठ बोलना चाहता हूँ। कहीं से भी कोई आवाज़ सुनाई न दे। सब चुपचाप सुनते रहें। कहीं से छिपकर मेरी आवाज़, उनके कान तक आती रहे। उन्हे दिखूँ नहीं। बस ऐसे ही छिपा रहूँ। पता नहीं यह कितनी रात पुरानी रुकी हुई पंक्ति है। इसे लिखना चाहता था, ‘रोक दी है’। जैसे, इतने दिन...
sangya tandon
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राग जौनपुरी और इससे जुड़े हि‍न्‍दी फि‍ल्‍मों के गीतों पर आधारि‍त ऑडि‍यो कार्यक्रमयह राग आसावरी थाट से उत्पन्न होता है। इसके आरोह में गंधार स्वर नहीं लगता, अवरोह सम्पूर्ण है, इसलिये इसकी जाति षाडव-सम्पूर्ण मानी जाती है इस राग का वादीस्वर धैव...
sangya tandon
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शास्‍त्रीय रागों में समय प्रबंधनहर राग को गाये जाने  के लिए एक समय निर्धारित होता है, इनका विभाजन बेहद वैज्ञानिक है. दिन के आठ पहर और हर पहर से जुड़े हैं रागों के विभिन्न रूप. आज इसी राग आधारित कार्यक्रम में समय प्रबंधन पर एक चर्चा हमारे सा...
sangya tandon
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राग क्‍या है, आरोह-अवरोह क्‍या होते हैं, शास्‍त्रीय संगीत से संबंधित सामान्‍य जानकारी के साथ आनंद लीजि‍ये कुछ नई फि‍ल्‍मों के ऐसे गीतों का जि‍न्‍हें संगीतकारों ने रागों को आधार बनाकर  धुनीकृत कि‍या है-            &n...
 पोस्ट लेवल : raag aaroh podcast avroh cgswar sangya tandon
Shachinder Arya
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कल बस इतना कहा था किताबें पढ़ना छोड़ दिया है। यह कहीं नहीं लिखा के उन्हे खरीदना भी बंद कर दिया है। शायद उन्हे अभी इकट्ठा कर, कभी इत्मीनान से कहीं बैठकर कहीं से भी पढ़ने लग जाऊँ। यह किन अर्थों में विरोधाभासी व्याघातक बात है, पता नहीं। शायद हम सब इन्ही के भीतर बनते-बिगड़...
Shachinder Arya
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{इसे यहाँ पोस्ट करने का मन नहीं था, फ़िर भी किए देता हूँ। इसके बाद यह कोई न पूछे, नीचे जो लिखा है; वह सच है या झूठ। कई चीज़ें सिर्फ़ यही नहीं होती। उससे आगे जाती हैं। बस कल सुबह एक क्लास में बैठा यही सब कागज़ पर उतरा। } अगर हम थोड़ा जोख़िम या साहस लेकर, ख़ुद को 'अध्यापक'...
Shachinder Arya
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उधर तुम होती हो। इधर मैं होता हूँ। और दोनों तरफ़ होती हैं हमारी आवाज़ें। आवाज़ें दोनों ओर आरपार होती जाती हैं। इन गुज़रती आवाज़ों में होती है, हमारी साँसों की धड़कनें। धड़कता मन। उनमें बहता ख़ून। वह खून जो दिल में धड़कता है। धड़कता है सपनों में। यह दिन। यह शाम। यह रात। ऐसे ह...
Shachinder Arya
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कुछ ऐसी जगहें होती हैं जहाँ हम ख़ुद होते हैं। अपने आप में बिलकुल नंगे। बिलकुल अकेले। बेपरदा। बेपरवाह। लिखने के पहले, लिखने के बाद, हम कुछ-कुछ बदल रहे होते हैं। शायद ख़ुद को। अपनी लिखी उन बातों को। जो चाहकर भी किसी से नहीं कह पाये। कहते-कहते रुक से गए। रुक गए उन्हे सब...
Shachinder Arya
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हम लोग इंतज़ार कर रहे थे शायद ऐसे ही किसी दिन का । ऐसी ही मुलाक़ात का। राकेश इस बार दस दिन लिए दिल्ली आया। दिवाली के दो दिन पहले। पर बे-तक्कलुफ़ होकर उस इत्मीनान से अपने-अपने हिस्से कभी खोल ही नहीं पाये। एक दूसरे से कुछ कह नहीं पाये थे। तय हुआ सब इस शनिवार इकट्ठे हो र...