ब्लॉगसेतु

Rinki Raut
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इक सफर पर मैं रहा, बिन मेरेउस जगह दिल खुल गया, बिन मेरेवो चाँद जो मुझ से छिप गया पूरारुख़ पर रुख़ रख कर मेरे, बिन मेरेजो ग़मे यार में दे दी जान मैंनेहो गया पैदा वो ग़म मेरा, बिन मेरेमस्ती में आया हमेशा बग़ैर मय केखुशहाली में आया हमेशा, बिन मेरेमुझ को मत कर याद हरग़ि...
 पोस्ट लेवल : Poetry on the relationship between writer and reader
Rinki Raut
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प्यार में नाकामी का तमगा हासिल है मुझे ठीक रेल में सवार पैसेंजर की तरह हर स्टेशन पर पुराना साथी उतरा नया साथी बनता गया । सफ़र तो अलग बात थी मंज़िल तक पहुंचना मुश्किल लगा मुझे।  रात में सन्नाटे का शोर दिन के शोर से ज़्यादा कानो में गूंजता है। मै अनसुना भी करू...
Rinki Raut
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मुलाकात हुई कुछ अपने जैसेकलम से सपने उकेरने वालेलेखकों से  उन्हें  लाइब्रेरी केहर कोने में देखा मैंनेजो खुशनसीब थेवो पुस्तक प्रेमियों के हाथ मेंसजे मिले  कुछ ऐसे भी थे जो लाइब्रेरी  के गलियारेके अलमारी में रखे  मिलेमुसकुरा रहे थेइस उम्मीद...
 पोस्ट लेवल : Poetry on the relationship between writer and reader