ब्लॉगसेतु

Bharat Tiwari
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स्थानीय जानकारों के मुताबिक केंद्र में पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकार और राज्य में लंबे समय से भाजपा सरकार होने के कारण अब इस संगठन को राम मंदिर, धारा 370 और समान नागरिक संहिता का मसला छोड़ देने को कहा गया है।(adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); (adsbygoo...
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उस अंतरराष्ट्रीय जगत को दिखाना चाहते हैं कि हमारे यहां अदालतें हैं और लोगोंं की रक्षा के लिए रात को भी अदालतें खुलती हैं। न्याय होता है। भूख, बेकारी, बीमारी से बिलबिलाते भारत को विकसित या विकास की ओर अग्रसर दिखाने में लगी सरकार अपने मुंह पर यह कालिख लगने नहीं देना...
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बलात्कारियों के समर्थन में तिरंगा यात्रा निकाली जा रही है — सत्येंद्र प्रताप सिंह  आक्रोशों लिखना पड़ रहा है, ऐसा पहले नहीं हुआ कि इतनी बेशर्मी से स्वतंत्र भारत के निवासी पर उसकी ही बनायी सरकार उसे पूरी तरह बेदम कर दे। नागरिकों के अधिकार का ऐसा अभूतपू...
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वह एक एरिया है, जहां से यह अहसास लिया जा सकता है कि गेट पार वाले इलाके में महिलाएं होती हैं।विपश्यना — सत्येंद्र प्रताप सिंह — संस्मरण: पार्ट 6#विपश्यना, एक संस्मरण: पार्ट 1इगतपुरी का विपश्यना केंद्र प्राकृतिक रूप से बहुत मनोरम स्थल पर बना हुआ है। पहाड़ी के नीचे बन...
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यदि आप शांति की खोज में रहने वालों में से एक है और आप इस श्रृंखला को नहीं पढ़ रहे हैं, तो मेरी सलाह मानिये, और ज़रूर पढ़िए. चिंतन मनन से यह (दुःख) दूर नहीं होता, बल्कि सच्चाई में जाना पड़ता है। बगैर सच्चाई जाने उसका निवारण नहीं किया जा सकता। यह कारण भीतर ही मिलता...
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photo: dnaindia.comतीसरा छोटी घंटी होती है, जिसका इस्तेमाल साधकों को हांकने के लिए धम्म सेवक लोग करते थे...सम्यक दर्शन वह है, जो सच्चाई अपनी अनुभूति पर उतरे। सुनी सुनाई, पढ़ी पढ़ाई, तर्क वितर्क करके मानी गई बात सम्यक दर्शन नहीं है। खुद अनुभूति करने वाला सत्य, सम्यक...
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विपश्यना — सत्येंद्र प्रताप सिंह — संस्मरण: पार्ट 4तपस्या बहुत कठिन लगने लगी थी। रात को 9 बजे से लेकर सुबह 4 बजे तक सोने के वक्त को छोड़कर लगातार व्यस्तता। व्यस्तता भी ऐसी, जो बोझिल हो। सुबह सबेरे घंटा बजता। घंटा अगर जगाने में सफल नहीं हुआ तो घंटी वाले बाबा टपक पड़...
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विपश्यना — सत्येंद्र प्रताप सिंह — संस्मरण: पार्ट 3सुबह सबेरे उठना भी एक कठिन टास्क होता है। खासकर ऐसी स्थिति में जब आपको 3 बजे रात को सोने और 11 बजे दिन में उठने की आदत पड़ चुकी हो। पहले दिन परीक्षण होना था कि उठ पाते हैं या नहीं। घड़ी की घंटी भी इतनी तेज नहीं थी...
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विपश्यना — सत्येंद्र प्रताप सिंह — संस्मरण: पार्ट 2आप भी गजब ही ढा रहे हैं। क्या झमाझम माहौल है। नयनाभिराम। आप हैं कि इनको फैक्टरी का मजदूर या स्कूली बच्चा बना देना चाह रहे हैं, जहां सब एक ही तरह के हों, एक ही हांके पर चल पड़ें। एक ही हांके पर उठें-बैठें। वह थोड़ा...
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विपश्यना — सत्येंद्र प्रताप सिंह — संस्मरणहम दुखी इसलिए हैं क्योंकि हम सुखद और दुखद संवेदनाओं के प्रति जाने बगैर प्रतिक्रिया देते हैं। विपश्यना में संवेदना के स्तर पर ही सुख या दुख की जानकारी हासिल करने की कला सिखाई जाती है।  (adsbygoogle = window.adsbygo...