ब्लॉगसेतु

Bharat Tiwari
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हम नहीं चंगे बुरा न कोय“पल्प फिक्शन”, 2004 के इकॉनोमिक टाइम्स में यह आर्टिकल छपा था, शायद वह पहली दफा था जब मैंने अपने लड़कपन के प्रिय जासूसी उपन्यासकारों वेद प्रकाश शर्मा और सुरेन्द्र मोहन पाठक के विषय में अखबार में पढ़ा था, साथ में राजहंस, गुलशन नंदा, नरेंद्र कोहली...
Sanjay  Grover
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मैं तब के वक़्त को याद करना चाहता हूं जब मेरी मां के मैं और मेरी छोटी बहन बस दो ही बच्चे थे। छोटी बहिन आठ या नौ महीने की और मैं शायद साढ़े तीन या चार साल का था। एक दोपहरबाद मेरी मां रसोई में बैठी जूठे बर्तनों का ढेरा मांज रही थी, मैं उसके पीछे कमरें में बैठा याद नही...
prabhat ranjan
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जब मैं यह कहता हूँ कि सुरेन्द्र मोहन पाठक हिंदी के सबसे लोकप्रिय लेखक हैं तो उसका मतलब यह लिखना नहीं होता है कि वे हिंदी के सबसे अच्छे लेखक हैं, सबसे बड़े लेखक हैं? लेकिन यह जरूर होता है कि हिंदी में जो लोकप्रिय लेखन की धारा है वे संभवतः उसके सर्वकालिक सबसे बड़े लेखक...
prabhat ranjan
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23 जुलाई को पटना में हिंदी की दुनिया में बदलाव के एक नए दौर की शुरुआत का दिन था. निर्विदाद रूप से हिंदी के सबसे लोकप्रिय अपराध-कथा लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक पटना आये, यहाँ के पाठकों से संवाद किया. लेखक कम आये लेकिन पाठक जी जैसे लेखक लगभग साठ साल से अगर लिखते हुए अपन...