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sanjiv verma salil
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नवगीत बाँस संजीव. अलस्सुबह बाँस बना ताज़ा अखबार..फाँसी लगा किसान नेखबर बनाई खूब.पत्रकार-नेता गयेचर्चाओं में डूब.जानेवाला गया हैउनको तनिक न रंजक्षुद्र स्वार्थ हित कर रहेजो औरों पर तंज.ले किसान से सेठ कोदे जमीन सरकारक्यों नादिर सा कर रहीजन पर अत्या...
 पोस्ट लेवल : नवगीत बाँस baans navgeet
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नवगीत:संजीव .बाँस रोपने बढ़ा कदम .अब तक किसने-कितने काटेढो ले गये,नहीं कुछ बाँटें.चोर-चोर मौसेरे भाईकरें दिखावामुस्का डांटें.बँसवारी में फैला स्यापाकौन नहींजिसका मन काँपा?कब आएगीकिसकी बारी?आहुति बने,लगे अग्यारी.उषा-सूर्य कीआँखें लाल.रो-रोक्षितिज-दिशा...
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नवगीत:संजीव.बाँस हैं हम .पत्थरों में उग आते हैंसीधी राहों पर जाते हैंजोड़-तोड़ की इस दुनिया मेंकाम सभी के हम आते हैंनहीं सफल के पीछे जातेअपने ही स्वर में गाते हैंयह न समझोनहीं कूबतफाँस हैं हमबाँस हैं हम.चाली बनकर चढ़ जाते हैंतम्बू बनकर तन जाते हैंनश्वर माया हमें...
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कृति चर्चा: बाँसों के झुरमुट से : मर्मस्पर्शी नवगीत संग्रह चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' *[कृति विवरण: बाँसों के झुरमुट से, नवगीत संग्रह, ब्रजेश श्रीवास्तव, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी लैमिनेटेड जैकेटयुक्त सजिल्द, पृष्ठ ११२, २५०/-, उत्तरायण प्रकाश...
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नवगीत संजीव. अलस्सुबह बाँस बना ताज़ा अखबार..फाँसी लगा किसान नेखबर बनाई खूब.पत्रकार-नेता गयेचर्चाओं में डूब.जानेवाला गया हैउनको तनिक न रंजक्षुद्र स्वार्थ हित कर रहेजो औरों पर तंज.ले किसान से सेठ कोदे जमीन सरकारक्यों नादिर सा कर रहीजन पर अत्याचार?बिना श...
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नवगीत:संजीव *बाँस के कल्ले उगे फिर स्वप्न नव पलता गया पवन के सँग खेलता मन-मोगरा खिलता गया*जुही-जुनहाई मिलींझट गलेमहका बाग़ रे!गुँथे चंपा-चमेलीछिप हायदहकी आग रे!कबीरा हँसता ठठामत भागसच से जाग रे!बीन भोगों की बजीमत आजउछले पाग रे!जवाकुसुमी सदाव्रतकर विहँ...
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नवगीत संजीव . अलस्सुबह बाँस बना ताज़ा अखबार. . फाँसी लगा किसान ने खबर बनाई खूब. पत्रकार-नेता गये चर्चाओं में डूब. जानेवाला गया है उनको तनिक न रंज क्षुद्र स्वार्थ हित कर रहे जो औरों पर तंज. ले किसान से सेठ को दे जमीन सरकार क्यों नादिर सा कर रही जन पर अत्या...
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कुण्डलियाबाँससंजीव.बाँस सदृश दुबले रहें, 'सलिल' न व्यापे रोगसंयम पथ अपनाइए, अधिक न करिए भोगअधिक न करिए भोग, योग जन सेवा का हैसत्ता पा पथ वरा, वही जो मेवा का हैजनगण सभी निराश, मन ही मन कुढ़ते रहेंनहीं मुटायें आप, बाँस सदृश दुबले रहें.राग-द्वेष करता नहीं, चाहे सबकी खै...
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हरिगीतिकाबाँससंजीव.रहते सदा झुककर जगत में सबल जन श्री राम सेभयभीत रहते दनुज सारे त्रस्त प्रभु के नाम सेकोदंड बनता बाँस प्रभु का तीर भी पैना बनेपतवार बन नौका लगाता पार जब अवसर पड़े.बँधना सदा हँस प्रीत में, हँसना सदा तकलीफ मेंरखना सदा पग सीध में, चलना सदा पग लीक मेंप्...
sanjiv verma salil
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हाइकुबाँससंजीव.वंशलोचनरहे-रखे निरोगज़रा मोचनhttp://divyanarmada.blogspot.in/