ब्लॉगसेतु

गौतम  राजरिशी
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"सुनो पीटर, हमारी मुहब्बत सलामत तो रहेगी ना ? उन्होंने ही तो संभाले रखा था अब तक, जब भी बिखरने को हुई ये !" परसों रात सुबकते हुये मेरी जेन ने पूछा था...लगभग सत्तावन साल पहले एक नये 'यूनिवर्स' का अस्तित्व जब सामने आया था तो पूरी धरती पर हर्ष और हैरत से भरे कोलाहल का...
Bhavana Lalwani
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कभी कभी ऐसा होता है कि कोई किताब, कोई कहानी या कोई किस्सा हमारी अपनी ज़िन्दगी के किसी बीते हुए हिस्से को फिर से दोहरा जाता है और तब लगता है कि "अरे ये तो मैं ही हूँ या मेरा भी कुछ ऐसा ही हाल हुआ करता था." सर्दियों की  सुबह की  गुनगुनी धूप  ज...