ब्लॉगसेतु

अमितेश कुमार
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9'0हिंदी समाज उपर से भले ही एकरूपी  समाज  दिखता हो लेकिन इसके भीतर पदसोपानिकता के विविध स्तर हैं.  वर्ग और वर्ण के अतिरिक्त बहुत सारीसामाजिक प्रकियाएं हिंदी समाज के भीतर की हलचल को निर्धारित करती हैं. इसको संचालित करने वाले कई सूत्रों में से सबसे हाव...
 पोस्ट लेवल : हिंदी रंगमंच hindi theatre
अमितेश कुमार
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नब्बे के बाद के दशक में किसी एक महत्त्वपूर्ण हिंदी नाटक का नाम लेने के लिये कहा जाये तो अधिकांश जिस एक नाटक का नाम लेंगे वह है, “जिस लाहौर नई वेख्या वो जम्याइ नई”. नाटककार - असगर वज़ाहत.  भारत के हर बड़े नाट्य समारोह में, हर बड़े शहर में, विविध भारतीय भाषाओं म...
 पोस्ट लेवल : Habib tanvir hindi theatre Asgar Wazahat
अमितेश कुमार
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यह  वर्षांत पर लिखी गई पोस्ट है. कुछ कारणों से यहाँ देरे से प्रकाशित हो रही है. 2016 के अंत में रंगमंच को रंगकर्म की संख्या से देखेंगे तो उत्साहजनक नजर आता है लेकिन जैसे ही निगाह गुणवत्ता की तरफ करते हैं तो यह उत्साह भी कम हो जाता है. हालाँकि यहाँ यह...
 पोस्ट लेवल : हिंदी रंगमंच hindi theatre
अमितेश कुमार
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व्योमेश शुक्ल स्थापित कवि और उभरते हुए रंगकर्मी हैं. हिंदी की कालजयी काव्य कृतियों पर नृत्य नाटिकाओं की प्रस्तुति से उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई है. इनके अब तक के रंगमंचीय सफर का एक परिचय प्रस्तुत किया है कवि-आलोचक अविनाश मिश्र ने.वस्तु स्थिति यह है कि—जब...
अमितेश कुमार
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भारतेंदु को भक्ति भाव की बजाये आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़ने की जरूरत है. यह लेख लंबे शोध लेख का हिस्सा है. पूरा पर्चा पढ़ने के लिये मेल करें. पर्चा पूर्व समीक्षित शोध जर्नल प्रतिमान के चौैथे अंक में प्रकाशित है. अठारहवीं सदी के उत्तर्राद्ध में ब्रिटिश का प्रवेश...
 पोस्ट लेवल : hindi theatre Bhartendu Harischandra
अमितेश कुमार
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पटना मंचन की तस्वीर, दा साहब की भूमिका में विनित कुमारहाय, हाय ! मैंने उन्हें देख लिया नंगा, इसकी मुझे और सजा मिलेगी  ।– अंधेरे में, मुक्तिबोधहिंदी रंगमंच के सन्दर्भ में एक बात जो साफ़-साफ़ दिखाई पड़ती है वो यह कि वह ज़्यादातर समकालीन सवालों और चुनौतियों से आंख चु...
अमितेश कुमार
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बीसवीं शताब्दी के पांचवें दशक से भारतीय रंगमंच में गतिशीलता आई. हिंदी रंगमंच[1]इसके केंद्र में था. इसमें एक तरफ़ राज्य ने संगीत नाटक अकादमी(सनाअ) और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय(रानावि) जैसे संस्थानों की स्थापना करके राष्ट्रीय रंगमंच की स्थापना की पहल की वहीं स्वतंत्र र...
अमितेश कुमार
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औपनिवेशिक भारत में अंग्रेजों के स्वमनोरंजन के लिये आयातित रंगमंच के अनुकरण से भारतीय भाषाओं में आधुनिक रगमंच का विकास हुआ. आधुनिक हिंदी रंगमंच का उद्भव भी इसकी कड़ी है. भारतेन्दु ‘जानकी मंगल' को हिन्दी का पहला मंचित नाटक घोषित करते हैं और क्षोभ प्रकट करते हैं कि "पश...
अमितेश कुमार
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कल से दिल्ली के रंगमंच पर कहानी के रंगमंच की वापसी हुई है. कल अंकुर जी के निर्देशन में चार कहानियों का मंचन हुआ. जिसमें ‘पाजेब’ सबसे जबरदस्त, ‘परदा’ और ‘चीफ़ की दावत’सामान्य और ‘उसने कहा था’ कमजोर रही. प्रस्तुति की कमजोरी का कारण अभिनेता और मजबूती का कारण भी अभिनेत...
अमितेश कुमार
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“ मुझे एक ऐसी भाषा की तलाश है,जो दृश्य हो,जो मंच की भाषा हो, ज्यादा प्रत्यक्ष, ज्यादा जिला देने वाली और अपने प्रभावों में शब्दों से भी कहीं अधिक शक्तिशाली हो साथ ही जो पुरानी कथानकों को नया रूप दे सकता है |”(आयनेस्को)[1]जो दृश्य हो, मंच की भाषा हो, ज्यादा प्रत्यक्ष...