ब्लॉगसेतु

Sanjay  Grover
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ग़ज़लमैं अपने देश में रहामैं पशोपेश में रहासदा तक़लीफ़ में रहाज़रा आवेश में रहावही होगा मेरा रक़ीबजो कई वेश में रहामैं क्यों ईमानदार हूंबहुत वो तैश में रहान मैं अमीर में रहान ही दरवेश में रहा-संजय ग्रोवर15-03-2019
Sanjay  Grover
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आप भी देख ही रहे होंगे, एक न एक न्यूज़-चैनल दिखा रहा होगा कि किस तरह त्यौहारों पर हर जगह मिलावटी मिठाईयां मिलतीं हैं जो स्वास्थ्य के लिए बेहद ख़तरनाक़ होतीं हैं। यहां क़ाबिले-ग़ौर तथ्य यह है कि सभी त्यौहार धर्म से जुड़े हैं, दुकानदार और सप्लाईकर्त्ता भी धार्मिक ही होते...
Sanjay  Grover
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प्रतीकात्मकता के कुछ वास्तविक फ़ायदे भी होते होंगे जो कि मुझे मालूम नहीं हैं लेकिन दुरुपयोग इसका जाने-अनजाने में ख़ूब होता लगता है। यहां तक कि ईमानदारी के आंदोलनों के दौरान या अंत में लोग अपनी कलाई में बंधे धागे नचाते हैं और स्टेज पर रोज़े खोलते हैं। पता नहीं ये लोग...
Sanjay  Grover
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ग़ज़लजब खुल गई पहेली, तो है समझना आसांसच बोलना है मुश्क़िल, लेकिन है गाना आसां पहले तो झूठ बोलो, ख़ुद रास्ता बनाओफिर दूसरों को सच का रस्ता बताना आसांवैसे तो बेईमानी .. में हम हैं पूरे डूबेमाइक हो गर मुख़ातिब, बातें बनाना आसांजो तुम तलक है पहुंचा, उन तक भी पहुंच...
rishabh shukla
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इत्ती सी खुशीअचानक दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी, रुची ने जाकर दरवाज़ा खोला तो स्तब्ध रह गयी| लेकिन यह क्या, ये तो वही व्यक्ती है जिनसे रुची कल मिली थी| इससे पहले की वो कुछ कह पाते की रुची बोल पड़ी - "मैने क्या किया साहब? मुझे आपका बटुआ रास्ते पर पड़ा मिला था| मै...
Sanjay  Grover
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लोग ग़ौर से देख रहे थे।कौन किसका पंजा झुकाता है ? कौतुहल.....उत्तेजना......सनसनी....जोश.....उत्सुकता......संघर्ष....प्रतिस्पर्धा.....प्रतियोगिता.....ईर्ष्या......नफ़रत......जलन.....धुंधला ही सही, लोगों को कुछ-कुछ नज़र आ हा था क्यों कि हाथों में अलग-अलग रंगों के द...
Sanjay  Grover
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मैं एक परिचित को बता रहा था कि सोशल मीडिया पर कोई नयी बात लिखो तो कैसे लोग पहले यह कहकर विरोध करते हैं कि ‘फ़लां आदमी बीमार मानसिकता रखता है’, ‘फ़लां आदमी ज़हर फैला रहा है’, ‘फ़लां आदमी निगेटिव सोच का है’. फिर उस आदमी को पर्याप्त बदनाम करके कुछ अरसे बाद वही बात अपने ना...
Sanjay  Grover
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खेलों के लिए किसीको पुरस्कार दिए जाएं या साहित्य के लिए, उसके लिए नियम तोड़े जाएं या नए जोड़े जाएं, व्यक्तिगत रुप से मुझे पुरस्कार कभी भी महत्वपूर्ण नहीं लगे। विवाह और राजनीति की तरह यह भी आदमी के दिमाग़ की उपज हैं। और ऐसी सब व्यवस्थाओं पर आज सवाल उठ रहे हैं, बहुत-से...
Sanjay  Grover
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04-07-2017मेरे पीछे का फ़्लैट(134-ए, पॉकेट-ए, दिलशाद गार्डन, दिल्ली) जो कई सालों से खाली पड़ा था, कुछ दिन पहले बिक गया है। कई दिनों से वहां से खटर-पटर, धूम-धड़ाम की आवाज़ें आ रहीं हैं। आज मैंने पिछले कई साल से बंद पड़ा अपने पिछले कोर्टयार्ड का दरवाज़ा खोला जो गंदगी से भर...
Sanjay  Grover
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एक बार मैंने फ़्लैट बेचने के लिए अख़बार में विज्ञापन दे दिया, बाद में उसे 4-5 बार रिपीट भी करवा दिया। एक सज्जन (लिखते समय थोड़ा शिल्प-शैली का ध्यान रखना पड़ता है वरना ‘श्रेष्ठजन’ उखड़ जाते हैं:-) जो प्रॉपर्टी का काम करते थे, मेरे पास चले आए कि हमारे होते अख़बार में विज...