ग़ज़लबिलकुल ही एक जैसी बातें बोल रहे थेवो राज़ एक-दूसरे के खोल रहे थेतहज़ीब की तराज़ू भी तुमने ही गढ़ी थीईमान जिसपे अपना तुम्ही तोल रहे थेअमृत तो फ़क़त नाम था, इक इश्तिहार थाअंदर तो सभी मिलके ज़हर घोल रहे थेवो तितलियां भी तेज़ थीं, भंवरे भी गुरु थेमिल-जुलके, ज़र्द फूल पे जो...