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sanjiv verma salil
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सुभाषित संजीवनी १*मुख पद्मदलाकारं, वाचा चंदन शीतलां।हृदय क्रोध संयुक्तं, त्रिविधं धूर्त लक्ष्णं।।*कमल पंखुड़ी सदृश मुख, बोल चंदनी शीत।हृदय युक्त हो क्रोध से, धूर्त चीन्ह त्रैरीत।।*http://divyanarmada.blogspot.in/
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साक्षात्कार के प्रश्न (१)    आप साहित्य की इस दुनिया में कैसे आए? कब से आए? क्या परिवार में कोई और सदस्य भी साहित्य सेवा से जुड़ा रहा है?मैं बौद्धिक संपदा संपन्न कायस्थ परिवार में जन्मा हूँ। शैशव से ही माँ की लोरी के रूप में साहित...
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पुस्तक चर्चा:'ऐसा भी होता है' गीत मन भिगोता है आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'  *[पुस्तक परिचय: ऐसा भी होता है, गीत संग्रह, शिव कुमार 'अर्चन', वर्ष २०१७, आईएसबीएन ९७८-९३-९२२१२- ८९-५, आकार २१ से.मी.x १४ से.मी., आवारण बहुरंगी, पेपरबैक, पृष्ठ ८०, मूल्य ७५/-, पहले...
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एक कुंडली- दो रचनाकार दोहा: शशि पुरवार रोला: संजीव *सड़कों के दोनों तरफ, गंधों भरा चिराग गुलमोहर की छाँव में, फूल रहा अनुरागफूल रहा अनुराग, लीन घनश्याम-राधिकादग्ध कंस-उर, हँसें रश्मि-रवि श्वास साधिकानेह नर्मदा प्रवह, छंद गाती मधुपों केगंधों भरे च...
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व्यंग्य लेख दही हांडी की मटकी और सर्वोच्च न्यायालय आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' *दही-हांडी की मटकी बाँधता-फोड़ता और देखकर आनंदित होते आम आदमी के में भंग करने का महान कार्य कर खुद को जनहित के प्रति संवेदनशील दिखनेवाला निर्णय सौ चूहे खाकर बिल्ली के हज जाने...
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कार्य शाला:दोहा से कुण्डलिया *बेटी जैसे धूप है, दिन भर करती बात।शाम ढले पी घर चले, ले कर कुछ सौगात।।  -आभा सक्सेना 'दूनवी' लेकर कुछ सौगात, ढेर आशीष लुटाकर।बोल अनबोले हो, जो भी हो चूक भुलाकर।। रखना हरदम याद, न हो किंचित भी हेटी। जा...
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दोहा मुक्तिका *नव हिलोर उल्लास की, बनकर सृजन-उमंग.शब्द लहर के साथ बह, गहती भाव-तरंग .*हिय-हुलास झट उमगकर, नयन-ज्योति के संग.तिमिर हरे उजियार जग, देख सितारे दंग.*कालकूट को कंठ में, सिर धारे शिव गंग. चंद मंद मुस्का रहा, चुप भयभीत अनंग.*रति-पति की गति देख हँस, शिवा दे...
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कार्यशाला-दोहा / रोला / कुण्डलियाशब्द-शब्द प्रांजल हुए, अनगिन सरस श्रृंगार।सलिल सौम्य छवि से द्रवित, अंतर की रसधार।।-अरुण शर्मा                                      &nbsp...
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कार्य शाला- दोहा / रोला / कुण्डलिया *खिलना झड़ना बिखरना जीवन क्रम है खास। कविता ही कहती नहीं, कहते सब इतिहास।। -पं. गिरिमोहन गुरुकहता युग-इतिहास, न 'गुरु' होता हर कोई। वही काटता फसल, समय पर जिसने बोई।।'सलिल' करे 'संजीव', न आधे मन से मिलना।बनो नर्मदा ल...
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कार्यशाला-दोहा से कुण्डलियारीता सिवानी-संजीव 'सलिल*धागा टूटा नेह का, बंजर हुई ज़मीन।अब तो बनकर रह गया, मानव एक मशीन।।मानव एक मशीन, न जिसमें कुछ विवेक है।वहीं लुढ़कता जहाँ, स्वार्थ की मिली टेक है।।रीता जैसे कलश, पियासा बैठा कागा।कंकर भर थक गया, न पानी मिला अभागा।।*१०...