ब्लॉगसेतु

Rajeev Upadhyay
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अद्यतन एक बहुत सुखकर प्रक्रिया है। खासकर बुढ़े बुजुर्गों के लिए। भारत एक पुरानी सभ्यता है तो यहाँ सब कुछ ही बहुत पुराना हो गया है। मतलब बुर्जुआ टाइप का! इसलिए इस विषम समय में भारत को अपडेट करते रहना भी एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण कार्य है। समय की घिसावट से कुछ नए आधुनि...
 पोस्ट लेवल : Hindi Article Satire Literature
समीर लाल
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बिजली विभाग औरउसकी रहवासी कॉलिनियोंसे मेरा बड़ाकरीब का साबकारहा है. पिताजी बिजली विभागमें थे और हम बचपनसे ही उन्हींकॉलिनियों में रहतेआये.मैने बहुत करीबसे बिजली सेखम्भों को लगते देखा है, एक से एक ऊँचे ऊँचे. उच्च दाब विद्युतवाले लंबे लंबेखम्भे और टॉवर भी, सबलगते देखें...
समीर लाल
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मौका है भारत से सात समंदर पार कनाडा में हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार के लिये आयोजित समारोह का. अब समारोह है तो मंच भी है. माईक भी लगा है.टीवी के लिये विडियो भी खींचा जा रहा है. मंच पर संचालक, अध्यक्ष, मुख्य अतिथि विराजमान है और साथ ही अन्य समारोहों की तरह दो अन्य प्...
समीर लाल
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भारत की आबादी को अगर आप त्रिवेणी पुकारना चाहते हैं, तो इत्मिनान से पुकार लिजिये. आपके पास तो अपने त्रिवेणी कहने का आधार भी होगा वरना तो लोग कुछ भी जैसे अंध भक्त, भक्त, देश द्रोही, गद्दार, पप्पू, गप्पू आदि जाने क्या क्या पुकारे चले जा रहे हैं, कोई कहाँ कुछ पूछ पा रह...
Sanjay  Grover
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ऐसे मौक़े पर किसी एक पक्ष के बारे में रचना लिख दो, अकसर मशहूर हो जाती है।किसीने लिख दिया कि हम पेपर नहीं दिखाएंगे।बिलकुल ठीक है, नागरिकता वगैरह के पेपर की मांग से ग़रीबों और दूसरे कई लोगों को बहुत मुश्क़िल होगी। वैसे भी, क्या गारंटी है जो यहां का निकलेगा वो अच्छा भी न...
समीर लाल
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काश!! आशा पर आकाश के बदले देश टिका होता!! वैसे सही मायने में, टिका तो आशा पर ही है.जिन्दगी की दृष्टावलि उतनी हसीन नहीं होती जितनी फिल्मों में दिखती है. इसमें बैकग्राऊंड म्यूजिक म्यूट होता है, वरना तो जाने कब के गाँव जाकर बस गये होते. मुल्ला मचान पर बैठे, खेतों में...
समीर लाल
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यूँ तो गुजरता जाता है हर लम्हा इक बरस,दिल न जाने क्यूँ दिसम्बर की राह तकता है..तिवारी जी आदतन अक्टूबर खतम होते होते एक उदासीन और बैरागी प्राणी से हो जाते हैं. किसी भी कार्य में कोई उत्साह नहीं. कहते हैं कि अब ये साल तो खत्म होने को है, अब क्या होना जाना है. अब अगले...
समीर लाल
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बचपन से ही मैं बाँये हाथ से लिखता था. लिखने से पहले ही खाना खाना सीख गया था, और खाता भी बांये हाथ से ही था. ऐसा भी नहीं था कि मुझे खाना और लिखना सिखाया ही बाँये हाथ से गया हो लेकिन बस जाने क्यूँ, मैं यह दोनों काम ही बांये हाथ से करता.पहले पहल सब हँसते. फिर डाँट पड़न...
समीर लाल
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कुछ लोग नमस्कार करने में पीर होते हैं और कुछ नमस्कार करवाने में. नमस्कार करने वाले पीर, चाहे आपको जाने या न जाने, नमस्ते जरुर करेंगे. कुछ हाथ जोड़ कर और कुछ सर झुका कर, शायद उनको मन ही मन यह शान्ति प्राप्त होती होगी कि अगले को नमस्ते किया है और उसने जबाब भी दिया है...
Rajeev Upadhyay
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इस बार के दशहरा में वो हुआ जो कभी भी नहीं हुआ था। जिसका सपना लोग सत्तर साल से देख रहे थे वो इस बार ‘पहली बार’ हो ही गया। कहने का मतलब है कि कई सौ साल पर लगने वाले सूर्य और चन्द्र ग्रहण की तरह। हजारों सालों में पहली बार आनेवाली दैवीय मूहुर्त की दीपावली की रात की तरह...
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