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sanjiv verma salil
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​​नवगीत *हैं स्वतंत्र परतंत्र न अपनादाल दले छाती पर*गए विदेशी दूर स्वदेशी अफसर हुए पराए.  सत्ता-सुविधा लीन हुए जन प्रतिनिधि खेले-खाए.कृषक, श्रमिक, अभियंता शोषित शिक्षक है अस्थाई.न्याय व्यवस्था अंधी-बहरी, है दयालु ना...
sanjiv verma salil
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मुक्तकसंजीव*शहादतों को भूलकर सियासतों को जी रहे पड़ोसियों से पिट रहे हैं और होंठ सी रहेकुर्सियों से प्यार है, न खुद पे ऐतबार है-नशा निषेध इस तरह कि मैकदे में पी रहे*जो सच कहा तो घेर-घेर कर रहे हैं वार वोहद है ढोंग नफरतों को कह रहे हैं प्यार वोसरहदों पे सर कटे ह...
girish billore
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