ब्लॉगसेतु

विजय कुमार सप्पत्ति
651
पारिजात के फूलभाग 1 – 1982 वह सर्दियों के दिन थे. मैं अपनी फैक्टरी से नाईट शिफ्ट करके बाहर निकला और पार्किंग से अपनी साइकिल उठाकर घर की ओर चल पड़ा. सुबह के 8:00 बज रहे थे. मैं अपने घर के सामने से गुजरा. मां दरवाजे पर खड़ी थी, मैंने मां को बोला ‘मां नहाने का पानी गर...
विजय कुमार सप्पत्ति
270
रूह की मृगतृष्णा मेंसन्यासी सा महकता है मनदेह की आतुरता मेंबिना वजह भटकता है मनप्रेम के दो सोपानों मेंयुग के सांस लेता है मनजीवन के इन असाध्यध्वनियों पर सुर साधता है मनरे मनबावला हुआ जीवन रेमृत्यु की छाँव में बस जा रेप्रभु की आत्मा पुकारे तुझे रेआजा मन रे मन  ...
विजय कुमार सप्पत्ति
270
मिलना मुझे तुम उस क्षितिज परजहाँ सूरज डूब रहा हो लाल रंग मेंजहाँ नीली नदी बह रही हो चुपचापऔर मैं आऊँ निशिगंधा के सफ़ेद खुशबु के साथऔर तुम पहने रहना एक सफेद साड़ीजो रात को सुबह बना दे इस ज़िन्दगी भर के लिएमैं आऊंगा जरूर ।तुम बस बता दो वो क्षितिज है कहाँ प्रिय ।© विजय
विजय कुमार सप्पत्ति
270
मेरे उम्र के कुछ दिन , कभी तुम्हारे साडी में अटके तो कभी तुम्हारी चुनरी में ....कुछ राते इसी तरह से ; कभी तुम्हारे जिस्म में अटके तो कभी तुम्हारी साँसों में .....मेरे ज़िन्दगी के लम्हे बेचारे बहुत छोटे थे.वो अक्सर तुम्हारे होंठो पर ही रुक जाते थे.फिर उन लम्हों के भ...
विजय कुमार सप्पत्ति
270
चल वहां चल ,किसी एक लम्हे में वक़्त की उँगली को थाम कर !!!!जहाँ नीली नदी खामोश बहती होजहाँ पर्वत सर झुकाए थमे हुए होजहाँ चीड़ के ऊंचे पेड़ चुपचाप खड़े होजहाँ शाम धुन्धलाती न होजहाँ कुल जहान का मौन होजहाँ खुदा मौजूद हो , उसका करम होजहाँ बस तू होचल वहाँ चलकिसी एक लम्हे म...
विजय कुमार सप्पत्ति
270
हमें लिखना होंगा जीवन की असफलताओं के बारे मेंताकि फिर उड़ सके हम इतिहास के नभ मेंहमें फूंकना होंगा टूटे हुए सपनो में नयी उर्जा ताकि मृत जीवन की अभिव्यक्ति को दे सकेकुछ और नयी साँसे !© विजय
 पोस्ट लेवल : विजय vijay sappatti जीवन
विजय कुमार सप्पत्ति
270
मैं खुदा के सजदे में था ;जब तुमने कहा, ‘मैं चलती हूँ !’.......इबादत पूरी हुई ................मोहब्बत ख़त्म हुई ..............................और ज़िन्दगी ?वि ज य
विजय कुमार सप्पत्ति
270
मिलना मुझे तुम उस क्षितिझ परजहाँ सूरज डूब रहा हो लाल रंग मेंजहाँ नीली नदी बह रही हो चुपचापऔर मैं आऊँ निशिगंधा के सफ़ेद खुशबु के साथऔर तुम पहने रहना एक सफेद साड़ी जो रात को सुबह बना दे इस ज़िन्दगी भर के लिएमैं आऊंगा जरूर ।तुम बस बता दो वो क्षितिझ है कहाँ प्रिय ।वि...
विजय कुमार सप्पत्ति
270
"माँ का बेटा"वो जो अपनी माँ का एक बेटा थावो आज बहुत उदास है !बहुत बरस बीते ,उसकी माँ कहीं खो गयी थी .....उसकी माँ उसे नहलाती ,खाना खिलाती , स्कूल भेजतीऔर फिर स्कूल से आने के बाद ,उसे अपनी गोद में बिठा कर खाना खिलातीअपनी मीठी सी आवाज़ में लोरियां सुनाती ..और उसे सुल...
विजय कुमार सप्पत्ति
270
रूह की मृगतृष्णा में सन्यासी सा महकता है मन देह की आतुरता में बिना वजह भटकता है मन प्रेम के दो सोपानों में युग के सांस लेता है मन जीवन के इन असाध्य ध्वनियों पर सुर साधता है मन रे मन बावला हुआ जीवन रे मृत्यु की छाँव में बस जा रेप्रभु की आत्मा पुकारे तुझे रे आजा मन र...