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सचिन श्रीवास्तव

 मध्य प्रदेश, भारत   पुरुष

नौवें दशक के शुरुआती साल में आंख खुली। गैर कांग्रेसी सरकार की हुकूमत में पहली बार बाहरी दुनिया से साबका पडा। ग्लोबल होती दुनिया में बुंदेलखंड के एक कस्बे ओंडेर से सफर शुरू किया। अशोकनगर (मध्यप्रदेश), मुंगावली (मध्यप्रदेश) की गलियों मॆं भटकते हुए भोपाल पहुँचा। बंजारा मिजाजी का सलीका सीखा। जालंधर और गुना मुख्तसर सी चाकरी के बाद रांची में कुछ सुकून के पल बिताये। यहीं दुनिया और इंसानों से प्यार करने की तौफीक मिली। फिर दिल्ली, जयपुर, सागर, बिलासपुर, उदयपुर, जबलपुर, इलाहाबाद, औरंगाबाद, नागपुर और लखनऊ की धूल फांकी। बदले में दोस्तों की मजबूत बाहों के साथ शाम की सडकें थीं और रातों में सिगरेटी धुएं की गंध। इसके बाद मेरठ से कानपुर, कानपुर से मेरठ, मेरठ से लुधियाना, लुधियाना से भोपाल, भोपाल से इंदौर और इंदौर से गाजियाबाद तक कई तरह के अखबारी दिमागों में झांका। अब फिर पुराने शहर की ओर