ब्लॉगसेतु

sanjay krishna
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राधाकृष्णकहा है कि मानव शरीर का संचालन उसका मस्तिष्क करता है, मगर मनुष्य के मस्तिष्क का संचालन कौन करता है? मनोविज्ञान के इस रहस्य को कोई नहीं जान पाया, लेकिन मुझे मालूम हो गया है कि पत्नियों के द्वारा ही मानव-मस्तिष्क का संचालन हुआ करता है। कम से कम मंटू बाबू के व...
sanjiv verma salil
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सॉनेट रस*रस गागर रीते फिर फिर भर।तरस न बरस सरस होकर मन।नीरस मत हो, हरष हुलस कर।।कलकल कर निर्झर सम हर जन।।दरस परस कर, उमग-उमगकर।रूपराशि लख, मादक चितवन।रसनिधि अक्षर नटवर-पथ पर।।हो रस लीन श्वास कर मधुबन।।जग रसखान मान, अँजुरी भर।नेह नर्मदा जल पी आत्मन!कर रस पान, प...
कुसुम कोठारी
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 अष्टमी का आधा चाँदशुक्ल पक्षा अष्टमी हैचाँद आधा सो रहा हैबादलों का श्वेत हाथीनील नदिया खो रहा है।तारकों के भूषणों सेरात ने आँचल सँवारारौम्य तारों की कढ़ाईरूप दिखता है कँवाराकौन बैठा ओढ़नी मेंरत्न अनुपम पो रहा है।रैन भीगी जा रही हैमोतियों की माल बिखरीनीर बरसा...
sanjiv verma salil
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सॉनेटरस*रस गागर रीते फिर फिर भर।तरस न बरस सरस होकर मन।नीरस मत हो, हरष हुलस कर।।कलकल कर निर्झर सम हर जन।।दरस परस कर, उमग-उमगकर।रूपराशि लख, मादक चितवन।रसनिधि अक्षर नटवर-पथ पर।।हो रस लीन श्वास कर मधुबन।।जग रसखान मान, अँजुरी भर।नेह नर्मदा जल पी आत्मन!कर रस पान, पुलक जय...
jaikrishnarai tushar
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 चित्र साभार गूगलएक गीत-फागुन की गलियों मेंचोंच मेंउछाह भरेजलपंछी तिरते हैं।शतदल केफूलों मेंअनचाहे घिरते हैं।होठों परवंशी केराग-रंग बदले हैं,पाँवों केघुँघरू सेकत्थक स्वर निकले हैं,स्वर केसम्मोहन मेंटूट-टूट गिरते हैं ।नए-नएफूलों कीगंध है किताबों में,कैसे कह दूँ...
sanjiv verma salil
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दोहा मुकतक बीत गईँ कितनी ऋतुएँ, बीते कितने सालकोयल तजे न कूकना, हिरन न बदले चालपर्व बसंती हो गया, वैलेंटाइन आजप्रेम फूल सा झट झरे, सात जन्म कंगाल*निशि दिन छटा बसंत की, देखें तन्मय मौन। आभा अंजलि में लिए, सजा रहा जग कौन।।सॉनेट   बसंत*पत्ता पत्ता...
Mayank Bhardwaj
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sanjiv verma salil
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सॉनेटक्यों?*अघटित क्यों नित घटता हे प्रभु?कैसे हो तुम पर विश्वास?सज्जन क्यों पाते हैं त्रास?अनाचार क्यों बढ़ता हे विभु?कालजयी क्यों असत्-तिमिर है? क्यों क्षणभंगुर सत्य प्रकाश?क्यों बाँधे मोहों के पाश?क्यों स्वार्थों हित श्वास-समर है?क्यों माया की छाया भाती?क्यों का...
कुसुम कोठारी
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 अप्रतिम सौन्दर्य हिम  से आच्छादित अनुपम पर्वत श्रृंखलाएँमानो स्फटिक रेशम हो बिखर गयाउस पर ओझल होते भानु की श्वेत स्वर्णिम रश्मियाँ जैसे आई हो शृंगार करने उनका कुहासे से ढकी उतंग चोटियाँ मानो घूँघट में छुपाती निज कोधुएँ सी उड...
sanjiv verma salil
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कृति चर्चा :'गाँधी के आँसू' : सामायिक विसंगतियों की तहकीकात आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'[कृति विवरण : गाँधी के आँसू, लघुकथा संग्रह, कनल डॉ. गिरिजेश सक्सेना, प्रथम संस्करण २०२१, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ १६४, /मूल्य २००/-, आईसेक्ट प्रकाशन भोपाल। ]*सा...